भाषा विज्ञान क्या है?
भाषा विज्ञान क्या है?

वास्तव में भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन को ही भाषा-विज्ञान कहते हैं। हम यह जानते हैं कि 'भाषा उच्चारण
अवयवों से उच्चारित मूलतः प्रायः यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की यह व्यवस्था है, जिसके द्वारा किसी भाषा-समाज के
लोग आपस में अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं।'
स्पष्ट है, भाषा-विज्ञान भाषा की उत्पत्ति, उसकी बनावट, उसके विकास तथा हास की वैज्ञानिक व्याख्या करता
है। विज्ञान का कार्य किसी वस्तु का परीक्षण करना, उसके कारणों का पता लगाना और तुलनादि द्वारा नियम निर्धारित
करना होता है। जाहिर है उसी तरह भाषा विज्ञान भी किसी भाषा विशेष की उत्पति, बनावट तथा उसके वर्तमान
एवं पूर्व रूपों की खोज करता है। यह उसके मूल रूपों की खोज करता है। उसकी गठन, प्रकृति और विकास की
वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। वह यह भी देखता है कि किसी भाषा के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में उसके कितने
प्रकार के स्वरूप बने और वे रूप कैसे और क्यों बने । इस प्रकार भाषा-विज्ञान ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन
कर भाषा की सम्यक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
आधुनिक परिभाषा के अनुसार भाषा-विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक और विशद है। भाषा-विज्ञान का कार्य
किसी निश्चित सीमा, देश-काल अथवा जाति से सीमित नहीं किया जा सकता। उसके अंतर्गत संसार की समस्त
बोलियाँ, भाषाएँ और परिभाषाएँ आ सकती हैं। यह भाषाओं के शुद्ध और अशुद्ध, साहित्यक और असाहित्यिक तथा
जीवित और मृत सभी रूपों की पर्यालोचना करता है। भाषा-विज्ञान भाषा के व्याकरण, अर्थात् शब्द, क्रिया, संज्ञा
तथा विशेषण आदि के रूपों और नियमों पर भी विचार करता है। वह यह भी देखता है कि 'मैं लिखा' न लिखकर
'मैंने लिखा' क्यों होना चाहिए ? साथ ही 'मैंने' और 'लिखा' आदि किस प्रकार संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और फिर
हिन्दी में आए। भाषा-विज्ञान यह भी देखता है कि शब्दों के बोलचाल तथा साहित्यिक स्वरूप में क्या अंतर है
भाषा के स्वरूप में कभी वृद्धि हो जाती है, कभी ह्रास हो सकता है। कभी उसके संयुक्त रूप के भिन्न-भिन्न
अवयव हो जाते हैं। कभी-कभी उसमें शब्द और ध्वनियाँ भी देश-काल तथा वातावरण के प्रभाव से आ जाती हैं
और शब्द की बनावट में परिवर्तन आ जाता है। इन समस्त परिवर्तनों की विवेचना भाषा-विज्ञान करता है।
भाषा-विज्ञान का संबंध संसार की समस्त भाषाओं के साथ होता है। उसे किसी भाषा को जानने के लिये इससे
संबंधित सभी अन्य भाषाओं को देखना पड़ता है। उदाहरणर्थ हिन्दी भाषा को जाँचने के लिये उसकी बोली और
साहित्यिक रूप दोनों को देखने के पश्चात् उसकी पूर्ववती भाषाएँ, क्रमशः शौरसेनी, अपभ्रंश, पालि, संस्कृत, प्राकृत
और वैदिक संस्कृत आदि सबका अध्ययन करना होगा । हिन्दी पर बाद में अरबी, फारसी और अंग्रेजी के प्रभाव पड़े।
साथ ही राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, मराठी और बंगला आदि भाषाओं का भी ज्ञान अपेक्षित होता है । तात्पर्य यह
है कि भाषा-विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है और इसका संबंध प्रायः सभी भाषाओं से होता है। इससे स्पष्ट होता
है कि सम्यक रूप से भाषा के बाहरी और भीतरी दोनों रूपों एवं उसके विकास आदि के सर्वांगीन क्षेत्र के अध्ययन
से भाषा-विज्ञान का प्रत्यक्ष लगाव है। भाषा-विधान के प्रकार : भाषा विज्ञान कई प्रकारों में से पहला
1. समकालिक भाषा-विज्ञान―इसे ही सांकालिक भाषा विज्ञान भी कहते हैं। ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान
में जहाँ इतिहास की किसी लंबी कालावधि को लेते हैं वहीं समकालिक में किसी एक खास समय को ही लेते हैं।
यह किसी भाषा की एक स्थिति का चित्र सामने लाता है। संभवतः इसलिये इसे 'स्थित्यात्मक' भाषा विज्ञान से
भी जाना जाता है। उदाहरणार्थ हिन्दी भाषा का क्या स्वरूप है, इसका अध्ययन समकालिक भाषा-विज्ञान के अंतर्गत
आएगा । ऐतिहासिक अध्ययन कई समकालिक अध्ययनों का शृंखलाबद्ध रूप होता है। 'समकालिक' के भी कई
भेदोपभेद किये जा सकते हैं । जैसे–
(क) वर्णनात्मक समकालिक–इसमें किसी भाषा का एक समय की सीमा में वर्णन किया जाता है। वर्णन
से आशय उसकी ध्वनियों, उसके रूप एवं वाक्य-गठन आदि के वर्णन से है। ग्लीसन नामक भाषा वैज्ञानिक ने 'एन
इंट्रोडक्शन टू डिस्क्रिप्टिव लिंग्टिस्टिक्स' में इसके स्वरूप पर बड़े विस्तार से चर्चा की है।
(ख) संरचनात्मक–इसे हिन्दी में 'रचनात्मक', गठनात्मक, घटनात्मक, संघटनात्मक आदि कई नामों
से अभिहित किया गया है। इसे वर्णनात्मक भाषा-विज्ञान का ही एक विकसित रूप माना जा सकता है। इसमें
वर्णनात्मक भाषा-विज्ञान की तो सारी बातें आ ही जाती हैं, साथ ही भाषा विशेष की पूरी संरचना का विश्लेषण
करके उसकी आंतरिक व्यवस्था को भी सामने लाते हैं। समकालिक में इन दो के अतिरिक्त स्तरिक व्याकरक
(Stratificational) वंछिमी (Tagmemics) तथा रूपांतरिक व्युत्पादक व्याकरण (Transformational erative grammar) आदि भी लिये जा सकते हैं।
2. ऐतिहासिक–इसमें कई समकालिक भाषा वैज्ञानिक वस्तु को मिला देते हैं तथा इसमें समय के साथ भाषा
विशेष में हुए परिवर्तन या विकास का अध्ययन करते हैं। इस तरह इसमें किसी भाषा के विभिन्न कालों का स्वरूप
श्रृंखलाबद्ध रूप में सामने आ जाता है । यह समकालिक के स्थित्यात्मक की जगह गत्यात्मक या विकासात्मक होता है।
3. तुलनात्मक–इसमें प्रायः एक ही या भिन्न परिवार की दो या अधिक भाषाओं का ध्वनि, रूप, शब्द-समूह,
वाक्य-गठन आदि दृष्टियों से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।
परंपरागत रूप में प्रायः ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषा-विज्ञान को एक ही माना जाता है। बात यह है कि
किसी भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन में या उसके पुराने रूप के पुनर्निर्माण में तुलनात्मक पद्धति की सहायता अनिवार्य
हो जाती है, बल्कि यह कहना भी अनुचित न होगा कि प्राचीन काल (1925 से पूर्व) का भाषा-विज्ञान तुलनात्मक
और ऐतिहासिक ही था। तभी उसे तुलनात्मक भाषा-विज्ञान या ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान कहते थे, किंतु अब की
स्थिति बदली है। अब भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन समकालिक तथा ऐतिहासिक दोनों ही प्रकार का हो सकता
है। आज की पंजाबी और खड़ी बोली का तुलनात्मक अध्ययन करके साम्य-वैषम्य आदि विषयक निष्कर्ष निकाले
जा सकते हैं। इन दोनों भाषाओं के इतिहास या विकास का भी तुलनात्मक अध्ययन हो सकता है। इनमें प्रथम
समकालिक है दूसरा ऐतिहासिक । इसलिये तुलनात्मक भाषा-विज्ञान को ऐतिहासिक से अलग स्थान देना उचित है।
4. इन तीनों से अलग भाषा-अध्ययन का एक प्रायोगिक रूप भी अब विकसित हो रहा है जिसे प्रायोगिक
भाषा-विज्ञान कहते हैं। इसमें विदेशी या देशी भाषा कैसे पढ़ाएँ, पाठ्य पुस्तकें, व्याकरण एवं कोष आदि कैसे बनाएँ,
अनुवाद कैसे करें, टाइपराइटर या भाषा से संबंद्ध अन्य यंत्रों में ध्वनि आदि की व्यवस्था कैसे करें, भाषा-सर्वेक्षण कैसे
करें तथा लोगों की श्रवण या उच्चारण विषयक अशुद्धियाँ आदि कैसे दूर करें वगैरह व्यावहारिक बातों को लिया जाता है।
भाषा-विज्ञान में इन पद्धतियों पर भाषाओं का अध्ययन कर विभिन्न भाषाओं के रूप और इतिहास आदि की
जानकारी तो प्राप्त की ही जाती है साथ ही इसी अध्ययन के आधार पर भाषा (सामान्य) की उत्पति, उसकी आरंभिक
अवस्था, विकास (बाह्य और आंतरिक) तथा गठन आदि के संबंध में सिद्धांतों का निर्धारण भी होता है। इसका
आशय यह है कि भाषा-विज्ञान के अध्ययन के दो रूप हैं:
(i) एक तो भाषाओं का वर्णनात्मक, तुलनात्मक : ऐतिहासिक या प्रायोगिक अध्ययन, और
(ii) उस अध्ययन के आधार पर भाषा के संबंध में सामान्य सिद्धांतों की खोज और निर्धारण ।
सो, दोनों एक दूसरे का सहारा लेते हुए आगे बढ़ते हैं।
भाषा-विज्ञान के इन दोनों रूपों को क्रम से 'व्यावहारिक रूप और 'सैद्धांतिक' रूप या कहा जा सकता है।
भाषा-विज्ञान के सैद्धांतिक रूप में भाषा विषयक सिद्धांतों का अध्ययन और निर्धारण होता है और व्यावहारिक रूप
में भाषा-विज्ञान का सिद्धांतों के आधार पर अध्ययन होता है। भाषा-विज्ञान नाम से प्रायः भाषा-विज्ञान के सैद्धांतिक
रूप का ही अर्थ लिया जाता है। इस दृष्टि से भाषा-विज्ञान की निम्नलिखित परिभाषा रेखांकित की जा सकती है :
'जिस विज्ञान के अंतर्गत समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रायोगिक (इससे बहुत कम सहायता
मिलती है) अध्ययन के सहारे भाषा (विशिष्ट नहीं, अपितु सामान्य) की उत्पति, गठन, प्रकृति एवं विकास आदि की
सम्यक व्याख्या करते हुए इन सभी के विषय में सिद्धांतों का निर्धारण हो, उसे भाषा-विज्ञान कहते हैं।'
भाषा विज्ञान का यदि केवल सैद्धांतिक रूप ही दृष्टि में न रखा जाय तो कहा जा सकता है―
"भाषा विज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा―विशिष्ट-कई और सामान्य, का समकालिक, ऐतिहासिक,
तुलनात्मक और प्रायोगिक दृष्टि से अध्ययन और तद्विषयक सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है।"
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