ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं
ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं
"जिसने ईमानदारी खो दी उसके पास खोने के लिए और कुछ नहीं बचता."
― जॉन लाइली
बेंजामिन फ्रेंकलिन ने सच ही कहा है कि 'ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है." जो व्यक्ति
के चरित्र को प्रस्तुत करती है. जब बच्चा किसी परिवार में जन्म लेता है, तो वह स्वयं
कई तरह की विरासत का हकदार बनता है. माना जाता है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला
माँ की गोद होती है. बच्चा परिवार में ही बड़ा होता है और अच्छी-बुरी सभी प्रकार की
आदतों को सीखता है. ईमानदारी का गुण भी इन्हीं आदतों का हिस्सा है. ईमानदारी
का गुण किसी भी व्यक्ति के साथ जीवन भर एवं जीवन के बाद भी जुड़ा रहता है.
आज भी जब ईमानदारी की चर्चा होती है, तो राजा हरिश्चन्द्र का नाम सबसे पहले
ध्यान में आता है
समय के साथ-साथ जीवन के मूल्य एवं आदर्श बदलते रहते हैं. मध्यकालीन संसार,
जो ईमानदार था, नैतिकतापूर्ण था. युक्ति-युक्त था, आज वह वैसा नहीं रहा है. प्राचीन
ईमानदारी की पवित्रता पर समय की धूल जम गई है और भ्रष्टाचार के बादल मँडराने
लगे हैं. फिर भी यह कहना सर्वाधिक उपयुक्त होगा कि ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत
नहीं है, परन्तु आज इस कलयुग में ईमानदारी शब्द ऐतिहासिकसा प्रतीत होने लगा है,
लोग ईमानदारी को छोड़कर भ्रष्टाचार की तरफ आकृष्ट हो चुके हैं, भ्रष्टाचार दो शब्दों
भ्रष्ट + आचार से मिलकर बना है. भ्रष्ट का मतलब होता है-बुरा या बिगड़ा हुआ तथा
आचार का मतलब होता है-आचरण अर्थात् भ्रष्टाचार का मतलब होगा-बुरा आचरण या
अनैतिक आचरण या अनुचित आचरण. जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों
के विपरीत जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत आचरण करने लगता है, तो वह
भ्रष्टाचारी कहलाता है. आज भ्रष्टाचार हमारे पूरे भारत देश के लगभग प्रत्येक क्षेत्र जैसे-
शिक्षा, चिकित्सा, राजस्व, वाणिज्य, विनिर्माण इत्यादि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों में अपनी
जड़ें फैला चुका है, ईमानदारी किसी भी क्षेत्र में नजर नहीं आती है,
वैसे ईमानदारी अनुशासन का ही हिस्सा है. अनुशासन एक आदर्श जीवन जीने की में
कला है और ईमानदारी इस कला का निर्धारण करती है. जब बच्चा जन्म लेने के
बाद अपनी विरासत में अच्छी आदतों को ग्रहण कर लेता है और उसे लक्ष्य बोध हो
जाता है, तो निश्चित ही वह अपने जीवन में सफल होने का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम
हो जाता है. ईमानदार नहीं होने का तात्पर्य केवल भ्रष्टाचार करने से नहीं है, बल्कि
मानवीय मूल्यों से जुड़े वे सभी पहलू, जिनमें अनैतिक व्यवहार हुआ हो, सभी ईमानदारी
के विपरीत माने जाते हैं, उदाहरण के लिए किसी के साथ भेद-भाव करना, किसी को
मानसिक व शारीरिक कष्ट पहुँचाना, अपने कर्म से मुँह मोड़ना व ईमानदारी से अपना
काम न करना, अवसर के हिसाब से अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी को प्रलोभन
देना व किसी से काम के बदले घूस माँगना इत्यादि सभी प्रक्रियाएँ बेईमानी व भ्रष्टाचार
में शामिल हैं अर्थात् ईमानदारी के खिलाफ हैं. इसके अतिरिक्त कालाबाजारी, जान-
बूझकर दाम बढ़ाना, सस्ता सामान लाकर महँगा बेचना आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं
और ईमानदारी को बाधित करते हैं.
ईमानदारी वह शब्द है, जिससे हम सभी बहुत अधिक परिचित हैं, हालांकि, इसका
अधिक प्रयोग नहीं किया जा सकता है ईमानदारी को परखने का कोई भी निश्चित
तरीका नहीं है. हालांकि, इसे बड़े स्तर पर महसूस किया जा सकता है. इसी का
परिणाम है कि आज भ्रष्टाचार बेरोकटोक. फल-फूल रहा है. भ्रष्टाचार पर लगाम
लगाने के लिए समय-समय पर सरकार द्वारा एवं सामाजिक संगठनों द्वारा तरह-तरह
के उपाय किए जाते रहे हैं, परन्तु फिर भी इसका समाप्त होना तो दूर की बात है,
अकुश लगाना तक एक दूभर कार्य बन चुका है. भ्रष्टाचार व बेईमानी वर्तमान युग
में भ्रष्टाचारियों के लिए सफलता का सर्वश्रेष्ठ साधन है, काम निकालने तथा श्री-
समृद्धि की रामबाण औषधि है. भ्रष्ट लोगों के लिए भ्रष्टाचार व बेईमानी का रोग बीमार
होते हुए भी बहुत मीठा है, प्यारा है. कुछ अपवादों को छोड़कर प्रत्येक नर-नारी,
गृहस्थ, राजनीतिक, सामाजिक नेता बेईमानी का प्यार पाने का आकाक्षी.
इन सबके बावजूद इस कलयुगी दौर में भी ईमानदारी जीवित है, तभी तो आजादी
के बाद से हमारे देश के प्रत्येक क्षेत्र में अनेक उपलब्धियों अर्जित की जाती रही हैं,
ये उपलब्धियाँ देश को और भी आगे ले जातीं, यदि देश में ईमानदारी का स्तर
मजबूत होता अर्थात् भ्रष्टाचार न होता, वह भी विशेषकर राजनीतिक भ्रष्टाचार, लेकिन
उदारीकरण और खुलेपन की नीति के बाद जहाँ भारत जैसे विकासशील देश ने तेजी से
विकास करते हुए विकसित देशों को चकित कर दिया है, वहीं प्रति वर्ष उजागर होने वाले
घोटाला और भ्रष्टाचारों ने देश में भुखमरी, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी
समस्याओं को कभी समाप्त न होने वाली समस्या का रूप दे दिया है. इन घोटालों
और भ्रष्टाचारों में राजनीतिक व्यक्तियों की संलिप्तता बार-बार प्रकाश में आती रहती हैं.
ऐसी स्थिति में आज देश की कोई भी राजनीतिक पार्टी घोटालों एवं भ्रष्टाचारों से
पूर्णतः मुक्त नहीं है, ईमानदार नेताओं की सूची दिन-ब-दिन छोटी होती जा रही है.
वर्तमान में राजनीति में सच्चरित्र व ईमानदार व्यक्तियों का अकाल पड़ गया है.
अतः वर्तमान समय में सामान्य जनमानस में राजनीति और भ्रष्टाचार को एक-दूसरे का
पर्याय माना जाने लगा है और ईमानदारी शब्द तो इनका विपरीतार्थ शब्द प्रतीत होने
लगा है. यही वजह है कि राजनीति में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को शंका की दृष्टि से
देखा जाने लगा है. ईमानदारी के ग्राफ को गिराने व भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए
राजनैतिक क्षेत्र सबसे अधिक जिम्मेदार है. राजनीति से ईमानदारी की दूरी घटने
अथवा भ्रष्टाचार के राजनीति से घनिष्ट सम्बन्ध बनने का ही परिणाम है कि आज
शासन-प्रशासन कमजोर हो गया है, इनकी कार्यकुशलता में कमी आई है. राज्य की
कल्याणकारी गतिविधियाँ कमजोर हो गई हैं, वे अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं.
आपराधिक गतिविधियों में वृद्धि होती है. काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था
स्थापित हो जाती है, जिससे आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास पर
भी विपरीत प्रभाव पड़ता है.
हमारे देश में हालत यह है कि जो व्यक्ति घूस लेते हुए पकड़ा जाता है. वही
व्यक्ति घूस देकर छूट जाता है. अर्थात् तात्पर्य यह है कि जो पहरेदार भ्रष्टाचार
रोकने के लिए तैनात किए गए हैं, वे खुद अपने अन्दर भ्रष्टाचार रूपी राक्षस को पाले.
हुए हैं. ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात तो दूर उसमें कमी लाने के
बारे में सोचना भी अत्यन्त दुखदायी है. अतः ऐसी स्थिति में ईमानदारी की विरासत
पर प्रश्नचिह्न लगता नजर आता है
ईमानदारी एक ऐसा शब्द है जिसकी चर्चा में कोई कमी नहीं होती है, अधिकारा
लोग ईमानदारी को सर्वोत्तम गुण बताते हैं, परन्तु जब उनसे उनकी ईमानदारी के बारे
में पूछा जाता है, तो ज्यादातर लोग अपने आप को संदेह की नजर से देखते हैं.
ईमानदारी को सभी बहुत पसन्द करते हैं, परन्तु अपनी स्वार्थ सिद्धि की लालसा में
बेईमानी को अपनाने से नहीं चूकते हैं जीवन में ईमानदार होना बहुत लाभदायक
होता है, ईमानदार लोगों पर सभी विश्वास करते हैं. इस बात से भी इनकार नहीं किया
जा सकता कि ईमानदार लोगों को कई बार कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है,
परन्तु यह सर्वविदित है कि जीत सदैव ईमानदारी की ही होती है
यदि ईमानदारी की विरासत को मजबूती प्रदान करना है अर्थात् भ्रष्टाचार
और बुराइयों के गुण को मिटाना है, तो समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी-अपनी
मनोवृत्ति को बदलने की आवश्यकता है, हमें झूठी शान, वैभव, सुख-सुविधा का लालच,
शान-शौकत में प्रतिस्पर्धा की भावना इत्यादि को त्यागना होगा तथा अपने मन को
मजबूत बनाना होगा, सच्चा संकल्प करना होगा, तभी तो ईमानदारी की विरासत को
मजबूत बनाकर भ्रष्टाचार पर विराम लगाया जा सकता है. लोगों को सांसारिक हकीकत
को समझना होगा, अनावश्यक धन का लालच छोड़ना होगा. इसमें कोई संदेह नहीं
कि ईमानदारी को क्षति पहुँचाने वाला सबसे बड़ा साधन धन है. लोगों को धन के मूल्य
को समझना होगा. धन क्या है, यह तो हमारे लिए सुख-सुविधाओं का साधन मात्र
है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी के पास ज्यादा धन है, तो वह अनाज से बने
पकवानों की जगह सोना-चाँदी फ्राई करके तो नहीं खा सकता, धनी व्यक्ति को भी
अपने जीवनयापन के लिए अनाज की आवश्यकता पड़ती है. यदि कोई धनी
आदमी बीमार होता है, तो वह दवाई की जगह हीरे मोती खाकर तो ठीक नहीं हो
सकता, उसे अपनी बीमारी को ठीक करने के लिए दवाई ही खानी पड़ेगी. अगर कोई
धनी व्यक्ति ट्रेन में एसी कोच में बैठा है, तो भी उसका कोच, जनरल एवं स्लीपर कोच
से तो पहले गंतव्य स्टेशन तक नहीं पहुँच सकता. हाँ थोड़ा-बहुत सुख-सुविधा में
अन्तर आ सकता है. क्षणभंगुर सुख-सुविधाओं, स्वाद इत्यादि के लिए अपने मन
को नियन्त्रण में रखना होगा, अतः इस तरह के मूल्यों पर अपनी बुद्धि एवं विवेक के
इस्तेमाल के सहारे भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयास किया जा सकता है. यदि धीरे-
धीरे सबकी सोच जिस दिन बदल जाएगी, उस दिन भ्रष्टाचार अपने आप ही समाप्त
हो जाएगा और ईमानदारी की विरासत मजबूत हो जाएगी.
ईमानदारी की विरासत को हस्तान्तरित करने व मजबूती प्रदान करने में शिक्षा का
बहुत बड़ा योगदान व भूमिका है. शिक्षा एक सतत् प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बच्चों का
व्यक्तित्व विकसित होता है और इसी व्यक्तित्व में ईमानदारी का गुण भी सम्मिलित
होता है. शिक्षा जन्म से ही प्रारम्भ होकर मृत्युपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है और बच्चा
हर पल, हर क्षण कुछ-न-कुछ सीखता रहता है. वास्तविक अर्थ में शिक्षा वह गतिशील
एवं सामाजिक प्रक्रिया है, जो मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास
करने में सहायता देती है, उसे विभिन्न प्रकार की आन्तरिक शक्तियों का सामंजस्य
करने में योग देती है, उसे जीवन एवं नागरिकता के कर्तव्यों व दायित्वों को पूर्ण
करने के लिए तैयार करती है तथा उसमें ऐसा विवेक जाग्रत करती है, जिससे वह
अपने समाज, राष्ट्र, विश्व और सम्पूर्ण मानवता के हित में चिन्तन, संकल्प और
कार्य कर सके यह सर्वविदित है कि शिक्षा के अभाव में कुछ भी सम्भव नहीं अर्थात्
जीवन में शिक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. शिक्षा हमारे किसी भी समाज का आईना
होती है. प्रत्येक देश के भविष्य निर्माण का मानदण्ड शिक्षा पर ही आधारित होता है,
शिक्षा के अभाव में ईमानदारी की विरासत की कल्पना करना व्यर्थ है.
ईमानदारी का गुण किसी व्यक्ति की सफलता व असफलता को प्रभावित करने में
भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो व्यक्ति समय के सदुपयोग के प्रति ईमानदार होता
है व निर्वाध गति से सफलता के रास्ते पर चलता रहता है. वास्तव में समय का सही
प्रबन्धन व सदुपयोग ही सफलता दिलाने में सबसे अधिक सहायक सिद्ध होता है. समय
तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकसमान होता है, परन्तु समय का ईमानदारी से योजनाबद्ध
प्रबन्धन किसी व्यक्ति को महान् व्यक्तियों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर देता है
समय किसी का इन्तजार नहीं करता है और वह निरन्तर चलायमान होता है, जो
व्यक्ति ईमानदारी से समय का सदुपयोग सीख लेता है, उसे सफलता प्राप्त करने से
कोई नहीं रोक सकता.
ईमानदारी की भावना ही अच्छे कर्मों का निर्धारण करती है. ईमानदारी से कर्म
के अभाव में सफलता की चर्चा व्यर्थ है। सम्पूर्ण जगत् में जितने भी श्रेष्ठ वीर, धीर,
ज्ञानी, साधु. खिलाडी, वैज्ञानिक, महापुरुष इत्यादि हुए हैं, सब अपने-अपने कर्मों के
प्रति ईमानदार रहे हैं और इन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हुए समस्त
समाज को उपकृत किया है. ठीक इसके विपरीत जो व्यक्ति ईमानदारी की विरासत
संभालने में असमर्थ रहकर अपने कर्मों के प्रति निष्क्रिय रहे हैं, उनको सफलता दूर-
दूर तक नसीब नहीं हुई. महाभारत, गीता, रामायण इत्यादि पवित्र ग्रन्थों में भी
ईमानदारी और कर्मशीलता का ही उपदेश मिलता है. वास्तव में ईमानदारी और कर्म
का नियम शाश्वत और अविचल है, इसे चाहकर भी छोड़ा नहीं जा सकता है और न
ही यह छूटता है, यह केवल जीवन का अंग ही नहीं, बल्कि जीवन की पहचान है. कर्म
एवं ईमानदारी से व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न होता है तथा इससे ही आनन्द की
अनुभूति भी होती है. इतिहास गवाह है कि जीवन में सफलता हासिल करने वाले,
महान् विभूति बनने वाले व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में अत्यन्त कर्मठ, ईमानदार व
परिश्रमशील व्यक्ति थे. कर्म एवं ईमानदारी के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा जाता है
कि इनसे ही भाग्य का निर्माण होता है.
निष्कर्षतः अन्ततः यह कहना उचित होगा कि ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत
नहीं है, जिसे सँभालने के लिए सामूहिक रूप से दृढ़ संकल्पित होकर सत्य के रास्ते
पर चलने की आवश्यकता है. बेईमानी व भ्रष्टाचार के सहारे मिलने वाले क्षणभंगुर
सुख को त्यागना होगा और सच्चाई की चुनौतियों का सामना कर ईमानदारी की
विरासत को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है.
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