ज्ञान में पूँजी निवेश, सर्वाधिक प्रतिफल
ज्ञान में पूँजी निवेश, सर्वाधिक प्रतिफल
विद्या नाम नरस्य कीर्तितुला भाग्यक्षये चाश्रयो ।
धेनुः काम दूधा रतिष विरहे नेत्रं तृतीय च सा ।।
सत्यकारायतन कुलस्य महिमा रत्नै विना भूषणम् ।
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्व विषय विद्याधिकार कुरू।।
शास्त्र में कहा गया है विद्या अर्थात् ज्ञान अनुपम कीर्ति है. भाग्य का नाश होने
पर आश्रय देती है कामधेनु के समान है. विरह में रीति समान है तीसरा नेत्र भी कहा
गया है. सत्कार का मन्दिर है. कुल महिमा है. वगैर रल का आभूषण है. इसलिए अन्य
सभी विषयों को छोड़कर हमें ज्ञान का अधिकारी बनना चाहिए. अर्थात् ज्ञान ही वह
एक मार्ग है. जिसकी सीढ़ी को पार कर के एक इन्सान अपने जीवन का मूल्य समझ
पाता है तथा जीवन के तरीकों को जान पाता है.
आदिकाल से ही हमारे भारतीय संस्कृति में ज्ञान का काफी महत्व रहा है. ज्ञान को
अमरत्व का साधन माना गया है, 'सा विद्या या विमुक्तेय' का मंत्र संसार की एकमात्र
हिन्दू सस्कृति से मिलता है इस तरह गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से शिक्षा को
जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है.
शिक्षा एक ऐसा आधार है, जिस पर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास
निर्भर करता है शिक्षा किसी भी राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक, विकास का शक्तिशाली
साधन है, शिक्षा राष्ट्रीय संसाधन एवं राष्ट्रकल्याण की कुंजी है.
प्राचीन भारत में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मुक्ति की चाह रही है बाद में समय-समय
पर शिक्षा ने भी उसी तरह उद्देश्य बदलते रहे हैं. हम जानते है कि संसार परिवर्तनशील
है संसार में इतिहास इस बात का साक्षी है कि समय के साथ-साथ उसकी शिक्षा का
स्वरूप भी बदलता है. वर्तमान में शिक्षा के क्षेत्र में धर्म एव नीतिशास्त्र की जगह विज्ञान
एवं तकनीकी पर काफी बल दिया जाता है. शिक्षा हमारे समाज की आत्मा है, जो एक
पीढ़ी से दूसरी पीढी में दी जाती है.
किसी ने सच ही कहा है कि सामान्य जिन्दगी जीने के लिए एक इन्सान को रोटी,
कपड़ा और मकान के अलावा जिस चीज की जरूरत होती है, वह है 'ज्ञान' आपके
धन, अस्त्र-शस्त्र कुछ समय के बाद या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर समाप्त, परन्तु
ज्ञान रूपी धन का न तो खोने का डर है न ही समाप्त होने का डर यह हमारे जीवन
पर्यन्त हमारी साया बनकर साथ रहता है अत: क्यों न धन को ज्ञान रूपी सम्पत्ति में
तब्दील कर दिया जाए.
ज्ञान प्राप्त करने के लिए खर्च किया गया धन कभी बेकार नहीं जाता, बल्कि
उससे कई गुना सूद समेत वापस मिल जाता है. ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का
शिक्षित होना आवश्यक होता है, ज्ञान के सन्दर्भ में दक्षिण अफ्रीका के
पूर्व राष्ट्रपति डॉ नेल्शन मंडेला ने ठीक ही कहा है कि "ज्ञान वह शक्तिशाली हथियार
है, जिससे आप पूरी दुनिया की तस्वीर बदल सकते हैं महात्मा गांधी ने तो यहाँ तक
कहा था कि आत्मा की प्यास ज्ञान से ही बुझती है.
इस प्रकार यह देखा जाए, तो शिक्षा एक अति महत्वपूर्ण निवेश और मानव विकास
में एक अनिवार्य तत्व है. अर्थव्यवस्था में शिक्षा को उद्योग के रूप में ही देखा जाता
है, क्योंकि शिक्षा आर्थिक विकास का एक अति महत्वपूर्ण साधन है यह राष्ट्र निर्माण,
नागरिक निर्माण एवं समाज निर्माण का माध्यम है हमारी राष्ट्रीय अवधारणा में ज्ञान
सभी के लिए आवश्यक है. यह हमारी बहुमुखी विकास में अगणी भूमिका निभाता
है यह समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा लोकतन्त्र के लक्ष्य को आगे बढाती है.
शिक्षा वर्तमान एवं भविष्य का विशिष्ट निवेश है. शिक्षा का मतलब अपने दिमाग में
सूचनाओं एवं जानकारियों को भरना नहीं है, बल्कि जानकारियों का सही उपयोग ही
असली शिक्षा है
उपर्युक्त तमाम बातें शिक्षा में निवेश के लिए प्रोत्साहित करती हैं वर्तमान में शिक्षा में
निवेश हमारी समाज एवं देश की जरूरत बन चुकी है. आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए,
तो जबतक कोई राष्ट्र अपने ससाधनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा ज्ञान के क्षेत्र में निवेश
नहीं करता, तबतक यह देश अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में पिछड़ी अवस्था में बना रहता
है, क्योंकि इस पृथ्वी पर जो कुछ अनुभूति
प्राप्त होती है, वह ज्ञान के बदौलत ही है. उत्पादन के सभी साधनों में सब का महत्व
है, परन्तु ज्ञान, कौशल एवं तकनीक के अभाव में उन साधनों पर गर्व करना अनुचित
प्रतीत होता है इन समस्त संसाधनों का क्रियान्वयन मनुष्य के अन्दर छिपे हुए ज्ञान
पर ही निर्भर है. अत ज्ञान में पूंजी निवेश के लिए बिना न तो एक सफल जिन्दगी जी
पाएंगे और न ही अपने देश एवं समाज को अच्छे संस्कार दे पाएंगे.
भारतीय इतिहास पर गौर किया जाए, तो हम देखते हैं कि हमारे पूर्वज अज्ञानी
नहीं थे, बल्कि उनमें ज्ञान इतनी कूट-कूट कर भरी हुई थी कि उन्होंने दो पत्थरों को
आपस में रगड़कर आग जलाना सीख लिया था. साथ ही जैसे-जैसे उन्हें सुख-सुविधाएँ
मिली, वे अपने जीवन को और अधिक सभ्य बनाते गए आज से हजारों वर्ष पहले आग
का आविष्कार, पहिया का आविष्कार आदि जितने भी आविष्कार हुए. उनका श्रेय ज्ञान
को ही जाता है बगैर ज्ञान के हम कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं आज दुनिया के
जितने विकसित देश हैं, वे सभी अपने राष्ट्रीय आय का सर्वाधिक हिस्सा नए-नए तकनीक
पर आधारित शान पर ही निवेश करते हैं और उसी के बदौलत सीमित संसाधन रहते
हुए भी दुनिया के शीर्थ देशों में पहचान बनाकर बहुमुखी विकास कर रहा है
वर्तमान समय में देखा जाए, तो दुनिया में ज्ञान प्राप्ति के लिए होड़ लगी है एक
साधारण आय वाले व्यक्ति भी अपने बच्चों को अच्छे-से-अच्छे विद्यालय में नामांकन
कराकर बेहतर ज्ञान प्राप्त कराते है शिक्षा पर निवेश पहले की अपेक्षा काफी बढ़ा है
क्योंकि इसका प्रतिफल बहुत ही सुखदायक होता है, हमें निवेश करते समय इस बात
का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि निवेश सही दिशा में हो रहा है या नहीं क्या निवेश
बच्चों के मनोनुकूल हो रहा है या नहीं
इन तमाम पहलुओं पर ध्यान देकर हम ज्ञान में पूंजी निवेश का सर्वाधिक प्रतिफल
प्राप्त कर सकते हैं पूंजी निवेश किए बिना हम अच्छी गुणवत्ता का ज्ञान हासिल नहीं
कर सकते जब ज्ञान अच्छी गुणवत्ता वाला होगा. तब हम उन्नति भी उसी तरह करेंगे
हमारा राष्ट्र जब विकसित होगा, तब हम आत्मनिर्भर बन जाएगे एवं दूसरों पर निर्भरता
समाप्त होगी हमारा समाज जबतक ज्ञान से सराबोर नहीं होगा, तबतक एक स्वस्थ
समाज का सपना नहीं देख पाएंगे इन सब बातो को अमल में लाने हेतु सरकार भी
कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं चलाकर इस दिशा में काफी प्रयासरत है, क्योंकि
सरकार यह देखती है कि जब तक मानव संसाधन को तकनीक से लेस नहीं करेंगे,
आज के प्रतिस्पर्द्धा में टिका रहना गुश्किल होता है तभी तो आज जितने भी विकासोन्मुख
राष्ट्र है. सभी ज्ञान के क्षेत्र में काफी निवेश कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर देखा
जाए, तो अमरीका, ब्रिटेन, चीन, जापान आज विकसित देशों की श्रेणी में इसलिए
गिने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने देश के विकास के लिए अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में
तरक्की के लिए. ज्ञान अर्जन करने में अपनी पूँजी को तत्परता से निवेश किया.
ज्ञान का मतलब सिर्फ शैक्षणिक ज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान अपने साथ समस्त
ब्रह्मांड को समटे हुए है. व्यापक अर्थ में हमारा पूरा विश्व एक विद्यालय की तरह है
यहाँ हर कहीं से शिक्षा ग्रहण की जा सकती है शिक्षा के अनेक रूप है-सामाजिक शिक्षा,
राजनैतिक शिक्षा, आर्थिक शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, सास्कृतिक शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा
वास्तव में हमें अपने-अपने देश के विकास के लिए इन सभी क्षेत्रों में पूंजी निवेश करने
की आवश्यकता है दुनिया के किसी भी क्षेत्र में उस क्षेत्र के सफल क्रियान्वयन के लिए
ज्ञान का होना नितात आवश्यक है ज्ञान की बदौलत ही तरक्की के हर क्षेत्र में निपुणता
प्राप्त की जा सकती है. यह ज्ञान में पूंजी निवेश का सर्वाधिक प्रतिफल होता है इसका
प्रतिफल इतना मीठा होता है, जिसके रसास्वादन से जिह्वा को सन्तुष्टि प्राप्त होती
है हम ऐसे ज्ञान को प्राप्त करके देश के विकास में सहायक होने वाले कार्यक्रम कृषि,
उद्योग एवं व्यापार, संचार, परिवहन, शिक्षा, चिकित्सा, फिल्म एवं खेल जगत् में उत्कृष्ट
प्रदर्शन कर अपने देश का नाम मानचित्र पर अकित करने में सफल होते है इससे न
केवल हमारे देश की दुनिया भर में प्रशंसा होती है, बल्कि दुनिया के अन्य देश इससे
सीख लेकर वह भी अपने देश की तरक्की में सहायक होने के लिए इसका अनुकरण करते
हैं यही ज्ञान में पूंजी निवेश का सर्वाधिक प्रतिफल है
ज्ञान की महत्ता का परिचय इस यात से चलता है कि दुनिया के जाने-माने विद्वान
महापुरुष स्वामी विवेकानन्द अमरीका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के अवसर
पर जितनी देर तक भाषण देते रहे, उतनी ही देर तक दर्शक निश्चित भाव से भाषण
को सुनते रहे स्वामी विवेकानन्द का कहना था कि "शिक्षा मनुष्य में निहित सम्पूर्णता
की अभिव्यक्ति है "उनका सपना भारत को शिक्षित करना था. वे भारत की दुर्दशा का
मूले कारण अशिक्षा को मानते थे जान मनुष्य के लिए उस आभूषण के
समान है जो सदेव हीरे और जवाहरात की तरह चमकते रहते हैं. मान की ही देन है
कि दीरबल, तेनारीराम, अश्वघोष, नागार्जुन एवं कालीदास जैसे महान विद्वानों ने अपने
व्यक्तित्व को निखारकर बड़े यो राजाओं के दरबार को सुशोभित किया. इतना ही नहीं,
महात्मा गांधी, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम,
रविन्द्रनाथ टैगोर जैसे प्रभावशाली महापुरुष, प्रो. एडम स्मिथ, प्रो. मार्शल, रॉबिन्सन, प्रो.
हिक्स जैसे महान् अर्थशास्त्री, श्याम बेनेगल, दादा साहब फाल्के जैसे महान् फिल्मकार,
अल्बर्ट आइन्सटाइन, न्यूटन, आर्कमिडीज, थॉमस, अल्बा एडीशन, मैडम क्युरी, स्टीफंस
हॉकीन्स जैसे कुशाग्र बुद्धि वाले वैज्ञानिक, चरक, धन्वंतरी सुश्रुत, जीवक जैसे श्रेष्ठ
चिकित्सक को आज हम इसलिए अनुकरण करते हैं, क्योंकि उन्होंने ज्ञान को सर्वोपरि
मानते हुए अपने अपने क्षेत्र के माध्यम से देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
अतः इतिहास के उन पन्नों से हमें भी सीख लेनी चाहिए, ताकि हम भी अपने अन्दर
संजोए हुए ज्ञान को उभारकर उसका समुचित उपयोग कर सकें और हमारा भी देश की
तरक्की में कुछ अंश योगदान हो सके.
एक आँकड़े के अनुसार हमारे देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तेजी से बढ़ते
शिक्षा के क्षेत्र में अगले पांच साल के दौरान 100 अरब डॉलर (लगभग 74.57 लाख
करोड़) के निवेश की सम्भावनाएँ हैं विशेषकर कुशल पेशेवरों की बढ़ती मांग तथा बुनियादी
ढाँचा क्षेत्र की जरूरत के कारण शिक्षा के क्षेत्र में निवेश की सम्भावनाएँ बढी हैं. इस
क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई दे रही है
और भविष्य में यह निवेश का सबसे बेहतर गंतव्य साबित हो सकता है.
आवश्यकता इस बात की है कि ज्ञान में पूँजी कब, कैसे और कहाँ निवेश किया जाना
चाहिए. बच्चों की शिक्षा में पूंजी निवेश तब शुरू कर देना चाहिए, जब बच्चा बाल्यावस्था
में रहता है. उस समय अगर हम पूँजी निवेश करते हैं, तो हमारा निवेश सार्थक हो
सकता है. बशर्ते की हम उसका क्रियान्वयन ठीक ढंग से करते रहें. बच्चे की शिक्षा में
सरकार, उसके माता-पिता, शिक्षक एवं सामाजिक परिवेश सब की भागीदारी
सुनिश्चित होनी चाहिए, बिना भागीदारी के कुछ भी खूबसूरत नहीं होने वाला, भागीदारी
ही सब कुछ है. आजकल के माता-पिता सोचते हैं कि अगर उन्होंने बच्चे को स्कूल
में डाल दिया, तो उनका सारा दायित्व खत्म हो गया. यह चलन अब रुकना चाहिए.
उदाहरण के लिए अगर एक किसान खेती में पूँजी निवेश करता है, तो सिर्फ पूँजी लगा
देने से ही उसका काम पूरा नहीं होता है, बल्कि उसे लगाने से लेकर निराई. सिंचाई,
कटाई एवं उसके भण्डारण तक ध्यान देने की जरूरत होती है. अतः हमें अपने बच्चों
को, जो कि कल के भविष्य हैं, उनमें पूँजी निवेश करके, उन्हें उचित वातावरण में
रखकर उच्च गुणवत्ता की शिक्षा दिलाना चाहिए. ताकि वे दुनिया के हर क्षेत्र में
तरक्की कर सके. ज्ञान की ही देन है कि हम चन्द्रमा तथा मंगल ग्रह पर जीवन के
सपने देख रहे हैं.
दुनिया में ज्ञान एवं ज्ञानी की ही पूजा होती है, मूर्ख की नहीं. ऐसा कहा जाता है
कि एक राजा अपने सम्पूर्ण राज्य भर में ही पूजा जाता है, लेकिन एक विद्वान एवं ज्ञानी
पुरुष जहाँ भी जाते हैं, अपने ज्ञान की रोशनी से अँधेरे को दूर करके चारों ओर
उजाला फैलाते हैं. वे देश और विदेश हर जगह पूजनीय होते हैं डॉ. भीमराव अम्बेडकर
इतने बड़े ज्ञानी हुए कि उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का संविधान
तक लिख डाला. अतः हमें भी इन तमाम बातों से सीख लेते हुए ज्ञान में पूँजी को
इस तरह निवेश करना चाहिए कि इसका सर्वाधिक प्रतिफल मिल सके.
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