भारतीय संविधान का दार्शनिक पक्ष–'संविधान की प्रस्तावना'
भारतीय संविधान का दार्शनिक पक्ष–'संविधान की प्रस्तावना'
सभी लिखित संविधानों में 'प्रस्तावना' अवश्य लिखी होती है. प्रस्तावना एक प्रकार
से संविधान का सूक्ष्म रूप होती है और संविधान का दिग्दर्शन कराने की क्षमता
रखती है संविधान निर्माता संविधान में निहित तत्वों को प्रस्तावना के माध्यम से
स्पष्ट करते हैं. प्रस्तावना इस प्रकार से संविधान के आदर्शात्मक' अथवा 'दार्शनिक
पक्ष को प्रकट करती है. भारतीय संविधान भी इसका अपवाद नहीं है.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार वह उद्देश्य प्रस्ताव है, जिसे पं.
नेहरू ने 1946 में प्रस्तुत किया था तथा जिसे कांग्रेस ने स्वीकृति प्रदान की थी. इस
'उद्देश्य प्रस्ताव' में प्रमुख बातें निम्नलिखित प्रकार थीं-
(i) संविधान सभा दृढ़ संकल्प की घोषणा करती है कि वह भारत को एक
स्वतंत्र गणराज्य घोषित करेगी.
(ii) देशी राज्य, यदि भारत में सम्मिलित होते हैं, सहित यह भारत को संघ
रूप में गठित करेगी.
(iii) इस स्वतंत्र एवं प्रभुत्व सम्पन्न राज्य को सत्ता जनता से प्राप्त होगी.
(iv) समस्त जनता को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थिति
तथा विधि के समक्ष समानता, विचार अभि व्यक्ति विश्वास, धर्म, उपासना व्यवसाय
तथा कार्य का आश्वासन दिया जाएगा.
(v) अल्पसंख्यकों, दलितों तथा पिछड़े वर्गों के लिए उपयुक्त परिमाणों की व्यवस्था
की जाएगी.
(vi) न्याय तथा सभ्य राष्ट्रों की विधि के अनुसार गणराज्य के राज्य क्षेत्र की
अखण्डता और जल, थल व आकाश पर उसकी रक्षा की जाएगी. अन्त में यह देश
विश्व शांति तथा मानव जाति के कल्याण हेतु अपना पूर्ण तथा सहर्ष योग देगा.
इस प्रकार से उद्देश्य प्रस्ताव के द्वारा पं. नेहरू ने संविधान के उद्देश्य को स्पष्ट
किया, जिससे एक ऐसी शासन व्यवस्था को जन्म दिया जाएगा, जो जनता की सहमति
से चलेगी, जिसमें स्वतंत्रता समानता व बन्धुत्व का वातावरण बनेगा, जिसमें सभी
प्रकार का न्याय प्राप्त होगा तथा देश अन्तर्राष्ट्रीय विधि का पालन करते हुए
अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शांति व सहयोग को आधार बनाकर विदेश नीति अपनाएगा. इस
प्रकार से पं. नेहरू ने भारत के भावी शासन के स्वरूप व उसके आदर्शों को स्पष्ट कर
दिया. वस्तुतः यह प्रस्ताव' उस दृढ़ संकल्प को व्यक्त करता है, जिसे स्वतंत्रता
आन्दोलन के काल में अपनाया गया था. तत्कालीन वातावरण जिसमें प्रतिहिंसा,
लूटमार हत्या व धार्मिक उन्माद व्याप्त था. उससे यह प्रस्ताव' सर्वथा मुक्त था. यह
एक साहसिक प्रस्ताव था तथा यह स्पष्ट करने में समर्थ था कि भारतीय संस्कृति के
तत्व अपने मूल रूप में विद्यमान थे और यह भी कि भारतीय चिन्तक शताब्दियों की
दासता व तत्कालीन परिस्थितियों से अप्रभावित थे. उनमें यह सामर्थ्य थी कि वह
देश के शाश्वत नियमों का निर्माण करते हुए सांस्कृतिक शाश्वत मूल्यों पर डटे रहें.
कांग्रेस के अधिकांश नेता आन्दोलन काल के तपस्वी व त्यागी व्यक्ति थे. उन्होंने सिद्ध
कर दिया कि वे किसी भी परिस्थिति में भारत के जीवन मूल्यों को क्षण भर भी
विस्मरण करने को प्रस्तुत नहीं है. स्पष्ट है कि भारतीय संविधान का निर्माण करने के
लिए यह प्रस्ताव' वर्तमान के लिए ही नहीं, अपितु भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक सिद्धान्त
अथवा आदर्श था.
इसी प्रस्ताव' के अनुसार भारतीय संविधान निर्मात्री सभा ने एक प्रस्तावना
तैयार की उसी के अनुरूप संविधान में व्यवस्थाएं कीं तथा 26 नवम्बर, 1949 को
संविधान निर्माण का कार्य पूर्ण किया. यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया
गया. संविधान की प्रस्तावना वर्तमान रूप में आगे बॉक्स में दिया गया है.
प्रस्तावना का वर्तमान स्वरूप
प्रस्तावना का वर्तमान स्वरूप कहने से यह स्पष्ट है कि यह अपने मौलिक रूप में
नहीं है और इसमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं. वास्तविकता तो यह है कि संविधान की
प्रस्तावना में जहाँ 'समाजवादी' व 'पंथ निरपेक्ष' शब्दों को जोड़ा गया है, वहीं
नागरिकों को इस राष्ट्र की 'अखण्डता' को जोड़कर इस ओर ध्यान आकृष्ट किया
गया. यह एक विवादास्पद प्रश्न है कि उपर्युक्त शब्दों को जोड़ना आवश्यक था
अथवा निरर्थक ही इसे संशोधित किया गया. संविधान के सभी प्रावधान यह संकेत
देते हैं कि शासन का उद्देश्य समाजवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहेंगे.
व्यवहार में धर्म व राजनीति को पृथक रखकर व सभी धर्मों को दूसरों के धर्म में
हस्तक्षेप न करते हुए पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करके धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना
की गई थी. राष्ट्र की 'अखण्डता' बनाए रखने का दायित्व स्वतः ही 'प्रभुत्व सम्पन्न'
जनता पर होता ही है तात्पर्य यह है कि इन शब्दों को (समाजवादी पंथ निरपेक्ष
तथा अखण्डता) 42वें संशोधन द्वारा न भी जोड़ा जाता तो कोई अन्तर नहीं पड़ता था,
फिर भी सम्भवतः जनता को और अधिक स्पष्ट करने की दृष्टि से यह किया गया.
संविधान की प्रस्तावना की व्याख्या करते हुए प्रसिद्ध न्यायविद व संविधान
विशेषज्ञ डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने इसकी विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए लिखा है―
"हमारे संविधान की आत्मा से मनुष्य की सभ्यता के आधुनिक विकास क्रम का
हृदय स्पन्दन है, उसकी अन्तरात्मा न्याय और समता एवं अधिकार और बंधुत्व के
आसव से अभिसंचित है."
संविधान की विशेषताओं का विवरण
निम्न प्रकार से है―
(1) संविधान का स्रोत 'जनता'― प्रत्येक संविधान शासन के विविध अंगों का
दायित्व निर्धारित करता है, उनके अधिकारों की व्याख्या करता है तथा उनके पारस्परिक
सम्बन्धों को स्पष्ट करता है. राज्य एवं नागरिकों के मध्य सम्बन्ध सुनिश्चित करने
का कार्य संविधान करता है संविधान देश का सर्वोच्च एवं मौलिक कानूनों का संग्रह
है. सभी शक्तियाँ संविधान द्वारा ही प्रवाहित होती हैं. प्रश्न यह है कि संविधान को
शक्तियाँ प्रदान करने का अधिकार किसने दिया?
संविधान की प्रस्तावना इसका उत्तर देती है- हम भारत के लोग यह अर्द्धवाक्य
ही स्पष्ट कर देता है कि समस्त शक्तियों का सोत स्वयं जनता है.
डॉ. अम्बेडकर ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा था कि "प्रस्तावना यह
स्पष्ट कर देती है कि उस संविधान का आधार जनता है एवं इसमें निहित प्राधिकार
और प्रभुसत्ता सभी जनता से प्राप्त हुई है."
(2) शासन के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की घोषणा― प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि
संविधान न केवल शासन के स्वरूप व कार्यों को ही स्पष्ट करता है, अपितु उन
आदर्शों अथवा लक्ष्यों को भी स्पष्ट करती है, जिनकी पूर्ति अथवा प्राप्ति के लिए
शासन के विविध अंग प्रयत्नशील रहेंगे यह उनकी मर्यादा को भी सुनिश्चित करती है.
इसके अनुसार शासन की समस्त गतिविधियाँ एवं कार्य इस प्रकार होंगे कि स्वतंत्रता,
समानता, न्याय एवं बंधुत्व के उद्देश्य को पूरा करे स्पष्ट है कि मात्र राजनीतिक
स्वतंत्रता ही नहीं अपितु सभी प्रकार की स्वतंत्रता व समानता की प्राप्ति ही शासन
का ध्येय होगा और न्याय व बंधुत्व की अनुभूति भी जनता कर सकेगी. इस प्रकार
का वातावरण निर्माण करने का दायित्व भी शासन का होगा तात्पर्य यह है कि शासन
शक्ति का प्रयोग इन आदर्शों की प्राप्ति के लिए किया जा सकेगा.
( 3 ) सर्व प्रभुत्व सम्पन्न― यह प्रस्तावना यह घोषणा भी करती है कि भारतीय राज्य
पूर्णरूप से स्वतंत्र होगा यह स्वतंत्रता न केवल आंतरिक क्षेत्र में होगी, अपितु बाह्य
क्षेत्र में भी होगी भारत अपनी समस्त नीतियाँ स्वतंत्रतापूर्वक निर्धारित करेगा.
'राष्ट्रमण्डल' अथवा अन्य किसी भी संगठन की सदस्यता उसकी स्वतंत्रता को सीमित
नहीं करेगी.
(4) लोकतांत्रिक― प्रस्तावना यह भी स्पष्ट करती है कि भारतीय शासन लोक-
तांत्रिक होगा, अर्थात् जनता की इच्छा पर आधारित होगा शासन की समस्त शक्तियों
का सोत केवल 'जनता' ही होगी और 'जनहित' ही उसका परम ध्येय होगा. जन-
प्रतिनिधि भी जनता से ही जनादेश प्राप्त करेंगे इसका यही अर्थ है कि जनता ही
वास्तविक अर्थों में सर्वोपरि होगी.
(5) गणराज्य― प्रस्तावना यह घोषित करती है कि भारत एक गणराज्य होगा.
अर्थात् भारत राज्य का अध्यक्ष एक निर्वाचित व्यक्ति होगा, जो जन भावनाओं
के अनुरूप कार्य करेगा. 'राष्ट्राध्यक्ष' वंश क्रमानुगत अथवा जीवन पर्यन्त के लिए नहीं
होगा, अपितु निश्चित अवधि के लिए होगा.
(6) समाजवादी प्रस्तावना में सन् 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा यह
स्पष्ट कर दिया गया है कि भारतीय शासन 'समाजवाद' की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील
रहेगा आर्थिक विषमताओं को दूर कर सामाजिक न्याय सभी नागरिकों को प्रदान
करेगा. यह लक्ष्य वह लोकतांत्रिक उपायों से प्राप्त करने का प्रयास करेगा, स्पष्ट है कि
भारतीय संविधान के अन्तर्गत 'स्वतंत्रता' की बलि 'समानता' की प्राप्ति के लिए नहीं दी
गई है. 'समानता' व 'स्वतंत्रता के मध्य समन्वय स्थापित करना और जन कल्याण
की दृष्टि से नीतियों का निर्धारण व क्रियान्वयन किया जाएगा.
(7) धर्म निरपेक्ष (पंथ निरपेक्ष)―पंथ निरपेक्ष शब्द जोड़कर यह स्पष्ट कर दिया
गया कि राज्य धर्म के आधार पर धर्म अथवा पंथ पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं
करेगा. सभी धर्म एवं पंथ के अनुयायियों को इच्छानुसार अपना धर्म, पंथ पालन की
स्वतंत्रता होगी, नागरिक इच्छानुसार उपासना पद्धति को अपना सकेंगे. यदि राज्य किसी
नागरिक के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, तो नागरिकों को भी यह अधिकार
नहीं होगा कि वह अन्य धर्मों के मामलों में हस्तक्षेप करे अथवा बाधाएं उत्पन्न करे.
धर्म व राजनीति का सम्मिश्रण भारतीय संविधान के अन्तर्गत सम्भव नहीं होगा.
(8) स्वतंत्रता प्रस्तावना के अनुसार नागरिकों को स्वतंत्रताएं प्रदान की गई है.
विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, परन्तु अभिव्यक्ति के नाम पर
देशद्रोह जैसे नारे देखने, सुनने को मिले, मनन-चिन्तन की स्वतंत्रता नागरिक
स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रताएं भी नागरिकों को बिना भेदभाव
अथवा पक्षपात को प्राप्त होंगी तात्पर्य यह है कि सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं का
उपभोग करने की अनुमति व अधिकार संविधान के अन्तर्गत नागरिकों को प्राप्त होगा.
(9) न्याय 'न्याय' लोकहित की वृद्धि का साधन है आर्थिक, सामाजिक व
राजनीतिक न्याय सभी नागरिकों को प्रदान करके संविधान शासन की शक्तियों को
मर्यादित करता है वहीं नागरिकों को आश्वासन देता है कि कोई नागरिक यह
अनुभव न करे कि शासन की नीतियाँ किसी व्यक्ति अथवा वर्ग के हित में ही कार्य
करती हैं. शासन बिना किसी भेदभाव अथवा पक्षपात के ऐसे वातावरण का निर्माण करेगा.
जिसमें सभी को यह विश्वास हो कि उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में न्याय प्राप्त हुआ
है. नागरिक सुविधाओं की प्राप्ति से यह न्याय की अनुभूति अधिक महत्वपूर्ण है. इससे
व्यक्ति में आत्म-संतोष की भावना जाग्रत होती है. अतः 'न्याय' शब्द को सम्मिलित
कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया गया है.
(10) समता प्रस्तावना में जहाँ 'स्वतंत्रता' तथा 'न्याय' की महत्ता को
स्वीकार किया गया है, वहीं 'समता' को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला है. विधि के समक्ष
समानता ही पर्याप्त नहीं है, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में पूर्णरूप से
समान अवसर को मान्यता मिली है. समानता से तात्पर्य अवसरों की समानता से है और
यह अवसर की समानता' को प्रदान की गई है, क्योंकि राज्य किसी भी आधार
पर पक्षपात अथवा भेदभाव की नीति भी नहीं अपना सकता. यह 'स्वतंत्रता' की पूरक
है और न्याय की मार्गदर्शक है
(11) राष्ट्रीय एकता व अखण्डता मूल प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकता' शब्दों का
प्रयोग किया गया था. 42वें संविधान संशोधन से इसमें राष्ट्रीय एकता व अखण्डता जोड़
दिया गया. राज्य जहाँ व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं गरिमा को बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील
होगा, वहीं ऐसा वातावरण निर्माण करेगा कि नागरिकों में राष्ट्रीय एकता व अखण्डता
बनाए रखने की प्रेरणा मिले राष्ट्रीय एकता. बंधुत्व व राष्ट्रीय अखण्डता को अक्षुण्य
बनाए रखने का उत्तरदायित्व नागरिकों पर होगा, वहीं राज्य का यह कर्तव्य होगा कि
वह अपनी नीतियों तथा उनके क्रियान्वयन में इन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दे यह तभी
सम्भव है, जब राज्य स्वतंत्रता, समानता व न्याय' सच्चे अर्थों में बिना किसी भेदभाव या
पक्षपात के सभी नागरिकों को प्रदान करे, संविधान की प्रस्तावना की विशेषताओं
को स्पष्ट करने के उपरान्त कुछ अन्य मान्यताओं पर ध्यान देने की आवश्यकता
उन तत्वों को हम निम्नलिखित पंक्तियों में स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं―
संविधान की प्रस्तावना का कानूनी महत्व नहीं है. न्यायालय इसके अनुसार
निर्णय नहीं देते यह तो संविधान की प्रकृति को स्पष्ट करती है. अतः संविधान यदि
शरीर है तो प्रस्तावना आत्मा है, आधारशिला है;
न्यायालय भी प्रस्तावना की भावना से प्रेरित होते हैं प्रस्तावना नूतन भावनाओं,
संकल्पों व आदर्शों का बोध कराती है. यह संविधान की कुंजी है, संविधान को उत्कृष्ट
रूप प्रदान करने की क्षमता से सम्पन्न है तथा शासकों का मार्गदर्शन करती है. यह
प्रस्तावना हमें उन आदर्शों का बोध कराती है, जो हमें स्वाधीनता संग्राम में प्रेरणा देते थे और जो राष्ट्र के भावी निर्माण में हमारा
पथ-प्रदर्शन करेंगे. इस प्रस्तावना से यह भी
स्पष्ट है कि यह किसी एक 'वाद' अथवा 'विचारधारा' से सीमित नहीं है. यह तो समाज
के प्रति व्यक्ति व वर्ग को सर्वोत्कृष्ट स्थान प्रदान कर समन्वयात्मक दृष्टिकोण अपनाने की
प्रेरणा देती है. व्यक्ति, समाज, राज्य आदि को श्रेष्ठतम रूप प्राप्त करने को उद्यत करती
है. संकुचित दृष्टिकोण के स्थान पर व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर 'मानव हितों' की ओर
हमारा ध्यान आकर्षित करती है. वस्तुतः इसमें 'मानवता' व 'सर्वोदय' के भाव हैं.
व्यक्ति व समष्टि के मध्य समन्वय' का भाव है, तो अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं विश्व शांति
का स्वप्न इसमें प्रदर्शित है. यह व्यक्ति के व्यक्तित्व की उन्नति की चरम सीमा तक
पहुँचाने का साधन है. इसमें भारत के भावी स्वरूप का चित्रण है, यह राजनयिकों के
लिए मार्गदर्शक सिद्धान्त है, तो समान्य जनता की आशाओं तथा आकांक्षाओं का
केन्द्र बिन्दु है, शासकों की मर्यादा निर्धारित करने का मूलमंत्र है, तो विश्व के लिए
शांति व सहयोग का संदेश है.
डॉ. सुभाष कश्यप का कथन विचारणीय है– "प्रस्तावना में निहित पावन आदर्श हमारे
राष्ट्रीय आदर्श हैं और जहाँ वे एक ओर हमें अपने गौरवमय अतीत से जोड़ते हैं, वहीं
वह भविष्य की आकांक्षाओं को सजोते हैं."
वस्तुतः संविधान की प्रस्तावना संविधान का दार्शनिक पक्ष है. यह राज्य के आदर्शों
व लक्ष्यों को निर्धारित करती है और समय-समय पर शासकों को प्रेरणा देती है. समाज
को सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली का निरूपण करती है. इसका महत्व है कि हम इस तथ्य
से विमुख नहीं हो सकते, किन्तु इसका महत्व तभी है, जब व्यावहारिक रूप से
शासक इसके अनुसार प्रामाणिकता से कार्य करें, श्रेष्ठतम शब्दों का भी कोई अर्थ नहीं
है, यदि उनके अनुसार कार्य न किया जाए. संविधान में वर्णित धाराएं स्थूल रूप में होती
है. उनको जीवन प्रस्तावना ही प्रदान करती है. यदि शासक केवल संविधान में वर्णित
धाराओं को ग्रहण करे और उसमें निहित भावना की उपेक्षा करें, तो फिर 'प्रस्तावना'
का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि संविधान की धाराओं की भाँति इसका कानूनी स्वरूप
नहीं है. इसलिए प्रस्तावना संविधान का 'दार्शनिक' अथवा 'आदर्शात्मक पक्ष अथवा
'अंग' ही माना जाएगा.
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