संजीविनी की कथावस्तु, उद्देश्यों और संदेशो में निहित
संजीविनी की कथावस्तु, उद्देश्यों और संदेशो में निहित
'संजीविनी' एक खण्ड काव्य है। इसकी कथा नौ सर्गों में है। राष्ट्रीय भावना
से ओत-पोत कविवर आरसी ने कच और देवयानी की पौराणिक कथा को आधार
बनाकर आधुनिक भारत की राष्ट्रीय समस्याओं का संस्पर्श किया है।
देवासुर संग्राम की कथा अत्यन्त प्राचीन है। देवता और दानवों में सदैव संघर्ष होता
रहा है। देवताओं ने बार-बार दानवों को पराजित किया, पर दानव हार कर भी पुनः द्विगुणित
शक्ति और तेज लेकर युद्ध में रत हो जाते। कारण राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य को संजीविनी
विद्या का ज्ञान था और उसी शक्ति से वे राक्षसों को पुनः जीवित कर देते थे। देवराज इन्द्र
'चिन्तित थे। देवताओं के समक्ष एक गम्भीर समस्या उपस्थित थी। सभा में सभी देवता मौन
थे। उनके गुरु वृहस्पति ने उनकी समस्या का समाधान किया कि यदि कोई देव-पुत्र राक्षसों
के गुरु शुक्राचार्य को प्रसन्न कर लें और उनसे संजीविनी विद्या का ज्ञान प्राप्त कर ले तभी.
कुशल है। पर राक्षसों के राज्य में जाने के लिए कोई तैयार नहीं था। तभी वृहस्पति का
तेजवान पुत्र कच खड़ा हुआ-सारी कठिनाइयों और आपत्तियों को झेल कर शुक्राचार्य से
विद्या प्राप्त करने के लिए कच को प्रस्तुत देखकर इन्द्र चौक पड़े और बोले 'सौम्य ! यहाँ
यम, कुबेर आदि दिक्पाल जैसे वीर शिरोमणि खड़े हैं, फिर भला तुम क्यों उस आग की
‘लपटों में जाओगे ?' उसने बड़े उत्साह से कहा कि 'पूज्य पिता का आशीर्वाद हो, सुर-संसद
की कृपा हो तो मैं गुरु-सेवा में आत्मसमर्पण कर दूँगा, संजीविनी सीख कर आऊंगा और.
औरों को सिखलाऊंगा। बृहस्पति बोले- 'जाओ तात्' ! गुरु-प्रसाद से ही विद्या प्राप्त होती
है।' इस प्रकार देवलोक से गुरुजनों का आशीष ग्रहण कर कच ने प्रस्थान किया।
नगर के कोलाहल से दूर शान्त तमसातट पर तपोवन के एक एकान्त आश्रम में
शुक्राचार्य रहते थे। जब कच वहाँ पहुँचा तो उस समय उनकी पुत्री देवयानी से उसकी भेंट
हुई। कच ने गुरु से भेंट करने की प्रार्थना की तथा अपना प्रयोजन भी बतलाया। देवयानी के
हृदय में उसके प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ। उसने समुचित सत्कार किया तथा कच को आश्वासन
दिया कि उसका मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा। कच गुरु शुक्राचार्य के चरणों पर विनीत हुआ
तथा उनका शिष्य बनने की चाह प्रकट की। कच की भक्ति से प्रभावित होकर शुक्राचार्य
संतुष्ट हुए। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और अपना शिष्य बना लिया। दस-शत वर्षों तक
ब्रह्मचर्य व्रत का संकल्प लेकर कच उनका शिष्य बन गया और एक योग्य, कुशल शिष्य
की तरह गुरु के चरणों का आशीर्वाद तथा निश्छल हृदय देवयानी का स्नेह पाकर अपनी
साधना में जुट गया। वह कठोर श्रम करता- गुरु की आज्ञा और साधना की धूप से न तो वह
विचलित होता और न देवयानी के प्रेम की चाँदनी से चंचल ही होता। साधना के पथ पर
अविचलित, अविश्रान्त भाव से वह गतिशील था।
इधर कच के प्रति राक्षसों में कौतूहल जगा गुरू शुक्राचार्य के भय से वे प्रत्यक्षतः
कुछ कर नहीं पाते थे। उनके हृदय में घृणा और विद्वेष का दावानल दहक रहा था। एक दिन
एकान्त पाकर दनुज के बालकों ने स्नेह का छल बिछाकर कच से सारी बातें जान ली ।
निष्कपट कच कुछ छिपा नहीं पाया, और तब दुष्ट-दानव बालकों ने उसे मार डाला। संध्या
हो जाने पर भी जब कच आश्रम नहीं लौटा तब देवयानी का हृदय शंका और त्रास से भर
उठा। उसके हृदय में कच के प्रति निश्छल प्यार पनप चुका था। वह विफल होकर अपने
पिता के पास पहुँची और अत्यन्त आतुर भाव से अपने भय का निवेदन किया। शुक्राचार्य
अपनी पुत्री को अत्यधिक प्यार करते थे। उन्होंने दिव्य मंत्रोच्चार किया तथा कच का आह्वान
किया। दूर-दूर तक उनका स्वर प्रतिध्वनित हो उठा और उत्तर के रूप में सुदूर देश में कच
की आवाज सुनाई पड़ी। कच पुनरुज्जीवित होकर सदेह उपस्थित हो गया। देवयानी के अश्रु
पुरित नैन खुशी से नाच उठे। कच से पूरी कहानी सुनकर शुक्राचार्य ने उसे सावधानी से रहने
की सीख दी। देवयानी ने संकल्प किया कि वह भविश्य में कच को अकेले वन में नहीं जाने
देगी। साधना का रंथ फिर बढ़ चला। पर राक्षसों के बीच खलबली मच गई थी। उनका द्वेष
बढ़ता गया और वे किसी उपयुक्त अवसर की खोज में थे। कच पूजा हेतु जब मधुवन से
फूल चुन रहा था राक्षसों ने उसे पुनः मार डाला और अस्थि-मांस को पीस कर जल की धारा
में विसर्जित कर दिया। एक बार फिर देवयानी के आकुल अन्तर को, स्नेह-शिथिल हृदय
को शान्ति तथा उल्लास देने के हेतु गुरु शुक्राचार्य ने कच को जीवित कर दिया।
एक दिन राजभवन के किसी उत्सव में गुरू और देवयानी दोनों गये हुए थे। कच
आश्रम में अकेला था। राक्षसों ने छल का सहारा लिया। कच को लगा मानों आश्रम की गाय
बाहर भय से चिल्ला रही हो। वह अस्त्र लेकर गो रक्षा के निमित्त बाहर निकला। राक्षसों को
अवसर मिला। उन्होंने उसे मार डाला तथा अस्थि-मांस को जला कर गुरू के पेय में मिला
दिया। बिना किसी आशंका की कल्पना किए हुए गुरू उसे पी गये ।
रात में जब शुक्राचार्य और देवयानी आश्रम आये तो कच का कहीं पता नहीं था। एक
अज्ञात भय से देवयानी सिहर उठी। मन की समस्त पीड़ाओं को वाणी देकर, वह पिता के
समक्ष गिड़गिड़ाने लगी। उसकी कातर वेदना युक्त आग्रह ने एक बार पुनः शुक्राचार्य को
कच को जिलाने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने फिर मंत्रोच्चारण किया। पर गुरु के उदर
में स्थित कच बाहर निकलने के विषय में धर्म-संकट में पड़ा हुआ था। गुरू का पेट चीर कर
निकलने का अर्थ होता गुरू की मृत्यु और कच को यह सोचना भी अभीष्ट नहीं था। अन्त
में देवयानी का अत्यधिक आग्रह देखकर गुरू ने कच को वहीं संजीविनी विद्या का ज्ञान
दिया। कच बाहर निकला और फिर उसी मंत्र के सहारे गुरू को भी जीवित कर दिया। साधना
की सिद्धि के अवसर पर कच ने गुरू के चरणों पर सिर रख दिया। स्नेह-शिथिल गुरू ने
उसे अपने पुत्र की समकक्षता दी तथा उसे जी भर का आशीर्वाद दिया।
उद्देश्य-पूर्ति के पश्चात् जब एक बार कच ने देवलोक जाने का निश्चय किया तो
देवयानी (गुरुसुता) ने उस पर अपना प्रेम प्रकट करके उससे रुक जाने की प्रार्थना की। कच
ने अपने कर्त्तव्य पालन की बात कह कर देवयानी की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया, साथ
ही यह बात भी स्पष्ट कर दी कि भगिनी के रूप में गुरु-सुता से वह विवाह की बात भी नहीं
सोच सकता। अन्त में निराश होकर देवयानी ने कच को शाप दे दिया कि संजिवनी विद्या
कच के काम नहीं आएगी। कच ने भी देवयानी के क्रोध को अनुचित बताकर उसे किसी
क्षेत्रीय की पत्नी बनने का शाप दे दिया। तदोपरान्त कच ने देवलोक जाकर संजीविनी
विद्या का प्रसार कर देवताओं में उत्साह भर दिया और देवताओं ने धर्म-युद्ध में तत्पर होकर
दानवों को परास्त कर दिया, स्वर्ग लोक में सुख और शांति छा गई। 'संजीविनी' का यही
कथानक है।
कवि की कोई व्यक्तिजन्य अनुभूति ही उसके काव्य में प्रस्फुटित होकर किसी
न किसी रूप में एक विशिष्ट मान्यता का प्रतिपादन करती है। यो तो पौराणिक आख्यान का
ही आधार लेकर कवि ने 'संजीविनी' खण्ड-काव्य की रचना की है, परन्तु आज की
विशिष्ट-परिस्थिति में कवि इस पौराणिक तथ्य में अपनी सम-सामयिक अनुभूतियों को व्यक्त
करके एक अभिनव संदेश देता है। राष्ट्रीय-चेतना और जातीय-गौरव से ही आज के तरुणों
के समक्ष त्याग, तपस्या और बलिदान का एक नया प्रतिमान प्रस्तुत करके (कच के चारित्रिक
उत्कर्ष के सहारे) अपनी मौलिक सद्भावनाओं को कविवर आरसी प्रदान जी ने 'संजीविनी'
काव्य में पिरो दिया है। अपनी इस 'संजीविनी' को समर्पण करते हुए प्रारम्भ में ही वे
बलिदानी वीर तरुण युवकों को आह्वान करते हैं।
दानवी हिंसा, बर्बरता तथा अकारण ही शांतिप्रिय स्वर्गवासियों को कष्ट देनेवाली
आसुरी वृत्ति के परिप्रेक्ष्य में कवि ने अपने देशवासियों को शत्रु की बर्बरता के निवारण हेतु
दृढ़-संकल्प की एक दिव्य आभा की ओर उन्मुख किया है―
एक चुनौती- सी आई है, जिसका उत्तर देना है।
नत-मस्तक होना न शत्रु के सम्मुख, लोहा लेना है। (पृष्ठ-3)
दुर्दान्त, रक्त-पिपासु दानवों की विनाश लीला के परिमार्जन के लिए इन्द्र की सभा
में जब विचार विमर्श होता है और देवराज इन्द्र देशवासियों का आह्वान करके शत्रु को
विनष्ट कर देने की बात करते हुए अन्त में अपनी निश्चित विजय की घोषणा भी करते हैं;
तो उस अवसर पर गुरु बृहस्पति के मुख से कवि ने एक युग-सत्य को कहलाकर एक नूतन
संदेश दिया है। शत्रु द्वारा आक्रमण कर दिये जाने के पश्चात् अपनी रक्षा में तत्पर होना
परिपक्व नीति नहीं है। पूर्व से ही आत्मरक्षा की बात सोचकर शत्रु पर आक्रमण कर देना
श्रेयस्कर होता है।
कवि ने इस 'खण्ड-काव्य' में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि दासता से बढ़कर
किसी भी देश-जाति के लिये दूसरी कोई ग्लानि और हीनता की बात नहीं हो सकती।
स्वतंत्रता ही आत्म-सम्मान और गौरव की जननी है। पराधीनता स्वीकार करके जीवित
रहनेवालों को धिक्कार है―
एक निमिष की पराधीनता से बढ़कर है मृत्यु भली।
और दासता के हलवे से भली मुक्ति की मूंगफली। (पृष्ठ-5)
तदन्तर कवि इस बात का संकेत देता है कि आपदाओं और कष्टों के सम्मुख भयभीत
व्यक्ति जीवन और कार्य क्षेत्र में असफल ही रहता है। कठिनाइयाँ तो सफलता की सीढ़ी हैं।
यह तो प्रकृति का नियम है कि सुख के बाद दुःख और दुःख के पश्चात् सुख का अविर्भाव
होता है। आज दुर्द्धर्श शत्रु की बर्बरता को सहन करके यदि हम उसकी क्रूरता को अपने
पौरूष और शक्ति से तहस-नहस कर दें तो आनेवाले कल हम अपने देश और समाज में
सुख-शांतिपूर्वक स्वतंत्रता का उपभोग करेंगे।
जब स्वर्गाधीश इन्द्र की सभा में दानवी आक्रमण के निवारणार्थ मंत्रणा होती है और
कच गुरु वृहस्पति से यह कहता है कि आप जिसे आज्ञा दें वही संजीविनी-विद्या की प्राप्ति
हेतु अपने जीवन की परवाह न करके दानव-लोक में जाकर आचार्य शुक्र का शिष्यत्व ग्रहण
करे, तो गुरु वृहस्पति आत्म-दान के दार्शनिक पहलू का विश्लेषण करते हुए कितनी सुन्दर
उक्ति देते हैं―
आत्मदान की मांग न होती, प्राप्त होती है बल से।
उसे न कोई ले सकता है किसी युक्ति, कौशल, छल से।
वह तो स्वयं प्रेरणा मन की, आत्मा की चिरवाणी है।
स्वेच्छा से देने वाला ही जीवन का बलिदानी है। (पृष्ठ-14)
गुरु वृहस्पति के उक्त कथन में स्वयं कवि की दार्शनिक चेतना, आत्म-बलिदान के
उद्दात स्वरूप को स्पष्ट करती हुई, आज के दिग्भ्रमित, निष्क्रिय भारतीय युवकों को एक
नूतन संदेश देती है।
इसके बाद गुरु वृहस्पति अपने पुत्र कच को गुरु कृपा का महत्व समझाते हैं जिसके
द्वारा ‘संजीविनी' काव्य का रचयिता अनुशासनहीन उच्छृंखल युवकों को गुरुजनों के प्रति
आस्थावान और श्रद्धालु होने का संदेश देता है। गुरु की महत्ता सार्वभौमिक, सार्वदेशिक
और सार्वजनीन है।
आज के इस पदार्थवादी युग में शिक्षा, विद्या और ज्ञान भी एक प्रकार का व्यापार
बन गया है। आज के युवक के लिए विद्या साध्य नहीं, साधन बन गई है। वह घर की चारपाई
पर आराम से पाठ्य-पुस्तक खोलकर सोने का उपक्रम करता है। नकल अथवा अकल से
परीक्षा में उत्तीर्ण होने का हर संभव दुःसाध्य प्रयास तो करता है, परन्तु पूरे वर्ष आराम में
खलल डालकर व्यर्थ के अध्ययन को पसन्द नहीं करता।
आगे चलकर कवि इस बात को स्पष्ट करता है कि किसी भी देशजाति की
जीवनीशक्ति उसके सदस्यों के चरित्र-बल अथवा सच्चरित्रता में ही सन्निहित है! सच्चरित्र
व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में जीवन-संग्राम में अन्तिम रूप से विजय प्राप्त करता है। आज की
स्वार्थान्धता एवं छीना-झपटी की इस विषम परिस्थिति में जबकि देश और समाज का हर
वर्ग और व्यक्ति पीड़ित है, उसका एकमात्र कारण सच्चरित्रता का अभाव ही है। जिस देश,
जाति अथवा समाज का चारित्रिक पतन हो गया, वह रसातल को चला जाता है। अतएव
हर स्तर पर चरित्रोत्थान की आवश्यकता है।
कच और देवयानी की प्रणय-रागिनी के मध्य कवि ने कर्त्तव्य और प्रेम का संघर्ष
दिखला कर कर्त्तव्यच्युत युवकों को जागरण का एक जीवन सन्देश दिया है। आज के
तरुण, यौवन के क्षणिक आवेग में समाज और देश को कौन कहे, परिवार और माता-पिता
के प्रति अपने कर्त्तव्य को भूल जाते हैं। देवयानी के प्रणय निवेदन की पृष्ठभूमि में कच का
कथन कर्त्तव्यनिष्ठा का कितना सुन्दर आदर्श प्रस्तुत करता है।
है नहीं अकृतज्ञ यों, अविनीत इतना ब्रह्मचारी।
जो तुम्हारे प्रेम को कर दे सुविस्मृत कवि-कुमारी।
किन्तु, ऐसे प्रेम से कर्त्तव्य भी कोई बड़ा है। (पृष्ठ-60 )
कवि बर्बर और दुद्धर्ष आतताइयों के विरुद्ध युद्ध में तत्पर शांतिप्रेमी जनों को
धर्म युद्ध की दीक्षा देता है। विद्या के धनी और सच्चरित्र व्यक्ति सदैव ही मानवता की रक्षा
में तत्पर रहेंगे। कच ने असीमित त्याग और कठिन तपस्या के पश्चात् संजीविनी विद्या प्राप्त
की थी, अतएव उस संजीविनी शक्ति का वह अनुचित उपयोग नहीं होने देगा। शक्ति
सम्पन्न लोगों की शक्ति केवल अमानवीय और विध्वंसक तत्वों के निवारण में लगनी
चाहिए। व्यर्थ का रक्त बहाना तो आतताइयों का कार्य है। कच के माध्यम से स्वयं कवि देश
के युवकों का अह्वान करता है। और मानवता से अभिभूत होकर उन्हें यह निर्देश भी देता है―
विश्व में पशुता भरी जब तक रहेगी।
हाथ में करवाल भी तबतक रहेगी। (पृष्ठ -69)
Comments
Post a Comment