संयुक्त राष्ट्र की भाषा बने हिन्दी

 संयुक्त राष्ट्र की भाषा बने हिन्दी

भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य हिन्दी को संयुक्त
राष्ट्र की भाषा बनाने का था. यह वह समय है, जब हिन्दी के पक्ष में अनेक अनुकूलताएं
हैं. केन्द्र की सत्ता में वह भारतीय जनता पार्टी है, जिसके दृष्टि-पत्र में हिन्दी को
राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का मुद्दा रहा है. इसी दल के नरेन्द्र
मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. मोदी दक्षेस नेताओं से हिन्दी में द्विपक्षीय वार्ताएं करके
और संयुक्त राष्ट्र संघ समेत दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी में दिए उद्बोधनों में
तालियाँ बटोर कर दुनिया को जता रहे हैं कि विश्व में हिन्दी को बोलने और समझने
वालों की संख्या करोड़ों में है. मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने जिस भाषा
में वोट माँगे, उसी भाषा को देश-विदेश में संवाद की भाषा बनाए हुए हैं. इसी समय
देश की हिन्दीभाषी सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं, संसद में प्रतिपक्ष के नेता रहते हुए
उन्होंने गूढ राजनीतिक विषयों एवं सामयिक मुद्दों को हिन्दी की सरल शब्दावली, किन्तु
आक्रामक लहजे में बोलकर अपना लोहा मनवाया है, तय है, यह वह माहौल है, जब
योग दिवस की तरह हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता दिलाई जा सकती है.
          अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार संयुक्त राष्ट्र की, 4 अक्टूबर, 1977 को
सम्पन्न हुई बैठक में, हिन्दी में भाषण देने का श्रेय जाता है, तब वे विदेश मंत्री थे.
इसके बाद वे सितम्बर 2002 में संयुक्त राष्ट्र की सभा में हिन्दी में बोले थे, लेकिन
ये भाषण मूलरूप से अंग्रेजी में लिखे हुए अनुवाद थे. चंद्रशेखर भी प्रधानमंत्री रहते हुए
मालदीव में आयोजित हुए दक्षेस सम्मेलन में हिन्दी में बोले थे. उनका यह भाषण मूलतः
हिन्दी में होने के साथ मौलिक भी था. मोदी ही हैं, जो अपनी पूरी ठसक के साथ
अलिखित भाषण देकर हिन्दी का गौरव बढ़ा रहे हैं. हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा
बनाने के संकल्प का माद्दा उनमें अन्य नेताओं की तुलना में कहीं ज्यादा है.
          भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी पाँच भाषाएं विश्व की 16 प्रमुख भाषाओं की
सूची में शामिल हैं. 160 देशों के लोग भारतीय भाषाएं बोलते हैं. विश्व के 93 देश
ऐसे हैं, जिनमें हिन्दी जीवन के बहुआयामों से जुड़ी होने के साथ, विद्यालय और विश्व
विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती है. चीनी भाषा मंदारिन बोलने वालों की संख्या, हिन्दी
बोलने वालों से ज्यादा जरूर है, किन्तु अपनी चित्रात्मक जटिलता के कारण, इसे
बोलने वालों का क्षेत्र चीन तक ही सीमित है. 
          शासकों की भाषा रही अंग्रेजी का शासकीय व तकनीकी क्षेत्रों में प्रयोग तो
अधिक है, किन्तु उसके बोलने वाले हिन्दी भाषियों से कम हैं. प्रारम्भ में संयुक्त राष्ट्र
की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी थीं. ये भाषाएं अपनी
विलक्षणता या ज्यादा बोली जाने के कारण नहीं, अपितु संयुक्त राष्ट्र की भाषाएं इसलिए
बन पाई थीं, क्योंकि ये विजेता महाशक्तियों की भाषाएं थीं. बाद में इनमें अरबी और
स्पेनिश शामिल कर ली गई. विश्वपटल पर हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे स्थान
पर होने के बावजूद इसे संयुक्त राष्ट्र में शामिल नहीं किया गया है. यही नहीं
भारतीय और अनिवासी भारतीयों को जोड़ दिया जाए, तो हिन्दी पहले स्थान पर आकर
खड़ी हो जाती है. भाषाई आँकड़ों की दृष्टि से जो सर्वाधिक प्रमाणित जानकारियाँ सामने
आई हैं, उनके आधार पर संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाओं की तुलना में
हिन्दी बोलने वालों की स्थिति इस प्रकार है: मंदारिन 80 करोड़, हिन्दी 55 करोड़,
स्पेनिश 40 करोड़, अंग्रेजी 40 करोड़, अरबी 20 करोड, रूसी 17 करोड़ और
फ्रैंच 9 करोड़ लोग बोलते हैं. जाहिर है, हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की अग्रिम पंक्ति में
खड़ी होने का वैध अधिकार रखती है.
        हिन्दी यदि संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन जाती है, तो हमें सुरक्षा परिषद् में भी जगह
मिल जाएगी. इसके अलावा जो अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठन हैं, उनमें भी हिन्दी के
माध्यम से संवाद व हस्तक्षेप करने का अधिकार भारत को मिल जाएगा. ये संगठन
हैं, अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, अन्तर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी, अन्तर्राष्ट्रीय
दूरसंचार संघ, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, विश्व
स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन और संयुक्त राष्ट्र
अन्तर्राष्ट्रीय बाल-आपात निधि (यूनिसेफ). इन विश्व मंचों पर हमारे प्रतिनिधि यदि देश
की भाषा में बातचीत करेंगे, तो देश का आत्मगौरव तो बढ़ेगा ही, भारत के लोगों का
यह भ्रम भी टूटेगा कि अन्तर्राष्ट्रीय संवाद कायम करने की सामर्थ्य हिन्दी शब्द भण्डार
में नहीं है.
          संयुक्त राष्ट्र भी दुनिया के प्रमुख देशों के मातृभाषियों के आँकड़े जुटाने का काम
आधिकारिक रूप से कर चुका है. केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, दिल्ली द्वारा इस सम्बन्ध
में विशेष प्रमाणिक रिपोर्ट तैयार कराई गई थी, जो 25 मई, 1999 को संयुक्त राष्ट्र
भेजी गई थी. 1991 की जनगणना के आधार पर भारतीय भाषाओं के विश्लेषण
का ग्रंथ 1997 में प्रकाशित हुआ था. संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक भाषाओं की तकनीकी
समिति द्वारा भारत सरकार को भेजे पत्र के साथ एक प्रश्नावली संलग्न करके हिन्दी की
स्थिति के नवीनतम आँकड़े माँगे गए थे. निदेशालय द्वारा अनेक स्तर पर तथ्यात्मक
आँकड़े इकट्ठा करने की पहल की गई. इन अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर चीनी
भाषा मंदारिन के बाद हिन्दी का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या दूसरे स्थान पर
है. 2011 की जनगणना के मातृभाषा सम्बन्धी आँकड़ों के अनुसार हिन्दी बोलने
वालों की संख्या और बढ़ जाएगी.
          केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र को भेजी गई रिपोर्ट में विश्व ग्रंथों को
आँकड़ों का आधार बनाया गया था. इस परिप्रेक्ष्य में एनकार्टा एनसाइक्लोपीडिया के
मुताबिक मातृभाषा बोलने वाले लोगों की संख्या है, मंदारिन 83.60 करोड़, हिन्दी
33.30 करोड़, स्पेनिश 33-20 करोड़, अंग्रेजी 32-20 करोड़, अरबी 18.60 करोड़,
रूसी 17 करोड़ और फ्रेंच 7:20 करोड़ वर्ल्ड अल्मानेक एंड बुक ऑफ फैक्टस् के
अनुसार मंदारिन 87.40 करोड़, हिन्दी 36-60 करोड़, स्पेनिश 32-20 करोड़,
अंग्रेजी 34-10 करोड़, रूसी 16-70 करोड़ और फ्रेंच 7.20 करोड़ है. गिनीज बुक ऑफ
वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार अंग्रेजी भाषियों की संख्या 33.70 करोड़ है, जबकि हिन्दी
भाषियों की संख्या 33.72 करोड़ है. हालांकि गिनीज बुक ने हिन्दीभाषियों की संख्या
1991 की जनगणना के आधार पर ही बताई है. विश्व भाषाई पत्रक स्रोत ग्रंथ
'लेंग्वेज एंड स्पीक कम्यूनिटीज' के अनुसार तो दुनिया में 96.60 करोड़ लोग हिन्दी
बोलते व समझते हैं. यानि हिन्दी का स्थान मंदारिन से भी ऊपर है. इन तथ्यपरक
आँकड़ों से प्रमाणित होता है कि संख्या बल की दृष्टि से मंदारिन को छोड़ अन्य भाषाओं
की तुलना में हिन्दी की स्थिति मजबूत है.
            हिन्दी के साथ एक और विलक्षणता जुड़ी हुई है. हिन्दी जितने राष्ट्रों की जनता
द्वारा बोली व समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएं उतनी नहीं बोली
जाती हैं. हिन्दी भारत के अलावा नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिनाद,
टुबैगो, सिंगापुर, भूटान, इण्डोनेशिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान में खूब बोली व
समझी जाती है. भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की उर्दू, इन दोनों
भाषाओं के बोलने में एकरूपता है. दोनों देशों के लोग लगभग 60 देशों में आजीविका
के लिए निवासरत हैं. इनकी सम्पर्क भाषा हिन्दी मिश्रित उर्दू अथवा उर्दू मिश्रित हिन्दी
है, हिन्दी फिल्मों और दूरदर्शन कार्यक्रमों के जरिए हिन्दी का प्रचार-प्रसार निरन्तर हो
रहा है. विदेशों में रहने वाले दो करोड़ हिन्दी भाषी हिन्दी फिल्मों, टीवी सीरियलों
और समाचारों से जुड़े रहने की निरन्तरता बनाए हुए हैं. ये कार्यक्रम अमरीका, ब्रिटेन,
जर्मन, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, हॉलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, थाइलैण्ड आदि देशों
में रहने वाले भारतीय खूब देखते हैं.
           भाषा से जुड़े वैश्विक ग्रंथों में दर्ज आँकड़ों के अनुसार तो हिन्दी को तुरन्त
संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन जाना चाहिए, लेकिन विश्वपटल पर भाषाएं भी राजनीति
की शिकार हैं, जो देश अपनी बात मनवाने के लिए लड़ाई को तत्पर रहे हैं, उन सभी
देशों अपनी-अपनी मातृभाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में बिठाने का गौरव हासिल
कर लिया है, लेकिन अब वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी विश्वपटल पर व्यापार व
विज्ञापन की सशक्त भाषा के रूप में उभर आई है. भारत समेत अन्य एशियाई देश
हिन्दी को अंग्रेजी के विकल्प के रूप में अपनाने लगे हैं. कई योरोपीय देशों में
एशियाई लोगों के लिए हिन्दी सम्पर्क भाषा के रूप में भी प्रयोग होने लगी है. प्रधानमंत्री
बनने के बाद से नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में हिन्दी में उद्बोधन देकर यह प्रमाणित कर
दिया है कि हिन्दी बोलने और समझने वाले लोग दुनिया के ज्यादातर देशों में हैं.
         संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 193 है. संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को
आधिकारिक भाषा बनाने के लिए योग दिवस की तरह एक प्रस्ताव लाना होगा, जिस पर
96 देशों की सहमति अनिवार्य होगी. यह सहमति बन जाती है, तो संयुक्त राष्ट्र के
विधान की धारा-51 में संशोधन होगा और उसमें संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में
हिन्दी जुड़ जाएगी. हिन्दीप्रेमियों का यह दायित्व बनता है कि वे इस दिशा में उचित
पहल करें, जिससे हिन्दी पहले तो देश के राजनीतिक एजेंडे में शामिल हो और फिर
इसकी अगली कड़ी में इसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने की मुहिम प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चलाएं. हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन जाती है,
तो इसे देश की राष्ट्रभाषा बनने में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा. ऐसा होता है, तो
भारतवासियों के लिए भाषाई दासता से मुक्ति का द्वार भी खुलने लग जाएगा.

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