निष्क्रिय मत बनना

                                        निष्क्रिय मत बनना

गति जीवन का नियम है. गतिहीनता व निष्क्रियता मृत्यु के लक्षण
हैं. महाभारत, गीता, रामायण आदि ग्रन्थ कर्मशीलता का उपदेश देते हैं.
शरीर को कर्म द्वारा मोक्ष का द्वार बनाया जा सकता है. महात्मा गांधी
का कथन द्रष्टव्य है कि "सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है."
      यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाए, तो हमें विदित होगा कि जिन पदार्थों को
हम जड़ कहते हैं, वे भी किसी-न-किसी रूप में गतिवान् बने रहते हैं. पृथ्वी, सूर्य,
चन्द्र आदि गतिवान् हैं. एक स्थान पर रखे हुए पदार्थ, खूँटी पर टँगे हुए वस्त्रादि कभी-
कभी अपने-आप गिर पड़ते हैं. बात सही है कि जो हमें गतिवान् नहीं दिखाई देता है,
वह भी वस्तुतः गतिवान् है. उपनिषद् कहता है कि ब्रह्माण्ड स्थिर प्रतीत होता है, परन्तु
वह भी गतिमान् है- "तदेजति तनैजति." संवेदनशीलता की सीमाएं हमारे ज्ञान की भी
सीमाएं बनती हैं. वस्तुतः गति सृष्टि का शाश्वत एवं सर्वव्यापी नियम है, तब हम
गतिहीन होने की ओर, निष्क्रिय होने की ओर प्रवृत्त होने का प्रयत्न क्यों करें? निष्क्रिय
व्यक्ति जीवित लाश कहा जाता है. क्या कोई भी व्यक्ति चाहेगा कि उसको इतना
निकम्मा एवं मृततुल्य समझा जाए?
          यदि सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, वायु गतिहीन हो जाएं, चलना बन्द कर दें, तो क्या हो ?
हमारे ऊपर क्या बीते? क्या हमने कभी सोचा है? मनुष्य यदि हाथ पर हाथ रखकर
बैठ जाएं, सर्वथा निष्क्रिय होने की बात करने लगें, तो परिणाम क्या हो? हम अपने
विनाश का मार्ग स्वयं प्रशस्त करेंगे. यही इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है. युद्ध-स्थल
में पहुँचकर अर्जुन ने प्रायः ऐसा ही किया था. संजय के शब्दों में- "रणभूमि में शोक
से उद्विग्न मनवाले अर्जुन इस प्रकार कहकर बाण सहित धनुष को त्याग कर रथ के
पिछले भाग में बैठ गए." अर्जुन को युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण को
 श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देना पड़ा. हमारे जीवन को प्रेरणा प्रदान करने के लिए गीता 
रूप भगवान सदैव हमारे सामने प्रस्तुत रहते हैं. 
         सामान्य अनुभव की बात है. डॉक्टर के परामर्श के अनुसार हम जब पूर्ण विश्राम 
करते हैं, तब भी सर्वत्र निष्क्रिय नहीं रहते हैं. भोजन, शयन, मल-मूत्र त्याग आदि कार्य
चलते रहते हैं, बोलते भी हैं, चिन्तन भी करते हैं. निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी
भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि मनुष्य सदा प्रकृति
जनित गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है.
          इसी सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन हमें सावधान भी करता है कि "यदि
मैं कर्म न करूँ तो सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएं". अनुसारी परिणाम होगा प्रलय,
         इसके बाद कर्म का विवेचन करते हुए बताया गया है कि अपने द्वारा किए हुए
कर्मों द्वारा हम व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण का हेतु किस प्रकार बन सकते हैं.
जो कर्म सोच-समझकर, विवेकपूर्वक किया जाए, वह पाप की श्रेणी में हो ही नहीं
सकता है महाभारतकार का सहज कथन प्रमाण है-"कर्मण्य बध्यते जन्तुर्विधया तु
प्रमुच्यते" विद्या का अर्थ ज्ञान है ज्ञानाग्नि हमारी पाप-वृत्ति को भस्म कर देती है.
       भारतीय, अभारतीय समस्त धर्म एवं ज्ञान ग्रन्थ इस बात को एक स्वर से स्वीकार
करते हैं कि कर्म के बिना न यज्ञ होता है, न अन्न उत्पन्न होता है और न मनुष्य का
जन्म, पालन आदि सम्भव है. कर्म का नियम शाश्वत और अविचल है, इसे छोड़ना चाहें,
तो वह छूटता नहीं है, वह जीवन का अभिन्न अंग ही नहीं, जीवन की पहचान है. जीवन में
हम यदि कुछ चाहते हैं-स्वास्थ्य, धन, यश आदि तो कुछ प्रयत्न तो करना ही पड़ेगा. हो
सकता है कि प्रयत्न करने पर हमें इच्छित फल की प्राप्ति न हो, परन्तु यह निर्विवाद एवं
निश्चित है कि प्रयत्न न करने पर कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकेगा. मूरे डिजरैली ने ठीक ही
कहा है-"कर्म सदैव सुख न ला सके, परन्तु कर्म के बिना सुख नहीं मिलता." नेपोलियन
ने विश्वास के साथ कहा था-"मैंने कर्म से ही अपने को बहुगुणित किया है.
          संसार में जितने भी श्रेष्ठ वीर, धीर, ज्ञानी, ऋषि और विमल शरीरधारी मनुष्य हुए
हैं, वे सब अपने-अपने कर्मों के फलस्वरूप हुए हैं, जो निष्क्रिय व्यक्ति होता है, उसे
सब वस्तुओं का अभाव होता है, उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता है. वह केवल दैव को
दोष देता है और अपने भाग्य को कोसता है. समस्त ज्ञानी जन धर्मग्रन्थ, आचरण
ग्रन्थ एक ही आदेश देते हैं-उठो, कर्म करो और आगे बढ़ो स्थिर पानी सड़ जाता है,
निष्क्रिय व्यक्ति भी अग्राह्य बन जाता है. बँधे हुए पोखर के जल की भाँति उसमें भी
सड़ांध आने लगती है.
        श्रीराम द्वारा सागर तट पर सेतु बाँधने की बात सबको मालूम है. विभीषण के
परामर्श को स्वीकार करते हुए श्रीराम जब सागर से मार्ग देने के लिए निवेदन करने के
लिए तैयार हो जाते हैं-
                       "सखा कही तुम्ह नीकि उपाई।
                        करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥"
      तब कर्मवीर लक्ष्मण को बहुत बुरा लगता है. वह उबल पड़ते हैं-भाग्य का
भरोसा आलसी करते हैं-
                         "कादर मन कहुँ एक अधारा ।
                           दैव दैव आलसी पुकारा ॥"
         और अन्ततः काम आता है श्रीराम का पुरुषार्थ जब वह समुद्र को सुखाने के लिए
अग्नि-बाण का संधान करते हैं, तब समुद्र की अक्ल ठिकाने आ जाती है और वह सब
प्रकार की सेवा-सहायता के लिए अपने को श्रीराम के सम्मुख प्रस्तुत कर देता है.
                          "करौ सो वेगि जो तुम्हहि सुहाई।"
        कर्म के बिना जीवन में सफलता की बात कौन कहे, सामान्यतः उसका निर्वाह भी
असम्भवप्रायः हो जाता है. अर्जुन यदि रथ के एक कोने में बैठे ही रहते तो परिणाम
क्या होता? पाण्डव पक्ष का जड़-मूल से विनाश और सम्भवतः अर्जुन को व्यतीत
करना पड़ता निन्दनीय एवं अपमानित जीवन. 
        पराधीन वही है जो निष्क्रिय एवं आलसी है. कर्मठ और कर्मवीर को कौन पराधीन 
बना सकता है? जापान और जर्मनी के ज्वलन्त उदाहरण सामने हैं. प्रजाजन की
कर्मशीलता ने दक्षिण कोरिया को विश्व के एक विकसित देश का दर्जा दिला दिया है.
कर्मशीलता के अभाव में भारत जैसा विशाल एवं सर्वसाधन सम्पन्न देश अभाव-ग्रसित एवं
विकासशील देश के रूप में सन्तुष्ट है.
          कर्तव्य कर्म करने वाला व्यक्ति अपने कर्म द्वारा पवित्र एवं विकसित होता रहता
है, लौकिक सफलता उसके लिए गौण होती है. महात्मा गांधी का यह कथन कर्म-पथ के
पथिक के लिए कितना प्रेरक है "सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है.'
            जीवन का सार यही है कि हम समस्त मोह, संशय, द्विविधा, भय आदि को त्यागकर
कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त रहें, निष्क्रियता मृत्यु से भी अधिक भयावह है, निष्क्रिय जीवन में
सफलता की कोई सम्भावना नहीं रहती है.
          याद रखें-
"जहाँ देह है, वहाँ कर्म तो है ही, उससे कोई मुक्त नहीं है. तथापि शरीर को
प्रभु मन्दिर बनाकर उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए."

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Comments

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