निष्क्रिय मत बनना गति जीवन का नियम है. गतिहीनता व निष्क्रियता मृत्यु के लक्षण हैं. महाभारत, गीता, रामायण आदि ग्रन्थ कर्मशीलता का उपदेश देते हैं. शरीर को कर्म द्वारा मोक्ष का द्वार बनाया जा सकता है. महात्मा गांधी का कथन द्रष्टव्य है कि "सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है." यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाए, तो हमें विदित होगा कि जिन पदार्थों को हम जड़ कहते हैं, वे भी किसी-न-किसी रूप में गतिवान् बने रहते हैं. पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र आदि गतिवान् हैं. एक स्थान पर रखे हुए पदार्थ, खूँटी पर टँगे हुए वस्त्रादि कभी- कभी अपने-आप गिर पड़ते हैं. बात सही है कि जो हमें गतिवान् नहीं दिखाई देता है, वह भी वस्तुतः गतिवान् है. उपनिषद् कहता है कि ब्रह्माण्ड स्थिर प्रतीत होता है, परन्तु वह भी गतिमान् है- "तदेजति तनैजति." संवेदनशीलता की सीमाएं हमारे ज्ञान की भी सीमाएं बनती हैं. वस्तुतः गति सृष्टि का शाश्वत एवं सर्वव्यापी नियम है, तब हम गतिहीन होन...
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